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डिब्बों व थैलियों में बंद उत्पादों में बासी का दौर

आहार में आहार के तत्व ही नहीं रहे। सभी कुछ नकली हो चुका है। अनाज, सब्जियां, फल- दूध सभी नीरस हो गए।

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सेहत के लिए खतरा बने जंक फूड को लेकर चिंता कोई आज की नहीं है। ब्रिटेन ने टीवी व ऑनलाइन प्लेटफाम्र्स पर रात ९ बजे से पहले जंक फूड के विज्ञापनों पर रोक भी बच्चों की सेहत से जुड़ी इसी चिंता को देखते हुए लगाई है। भारत में भी जंक फूड ने पैर पसार लिए हैं। श्रद्धेय कुलिश जी ने तीस बरस पहले खान-पान में आए बदलाव के खतरों को लेकर आगाह करते आलेख में साफ लिखा था कि हमारे यहां भी नकली या बासी का दौर चल निकला है। प्रस्तुत है आलेख के प्रमुख अंश:

शरीर की सबसे बड़ी आवश्यकता खान-पान है। शरीर ही समस्त सांसारिक कर्मों के सम्पादन का एक मात्र साधन है। इसी में मन, बुद्धि और आत्मा का निवास है। विदेशों में विशेषत: पश्चिमी देशों में खान-पान एकदम बिगड़ चुका है। आहार में आहार के तत्व ही नहीं रहे। सभी कुछ नकली हो चुका है। अनाज, सब्जियां, फल- दूध सभी नीरस हो गए। इस पर भी खाद्य या पेय वस्तुओं को रसायन के जोर से डिब्बों, बोतलों और थैलियों में बंद कर ज्यादा बासी या नकली बना दिया जाता है। हमारे यहां भी नकली और बासी का दौर चल पड़ा है। गांव अभी कुछ बचे हुए हैं। हमारे नेताओं की अनुकम्पा बनी रही तो समूचा देश एक दिन नकली या बासी हो जाएगा। खान-पान का तरीका या पकाने का तरीका पहले से ही यूरोप के देशों में परिष्कृत नहीं था। मुख्य आहार मांस को उबालकर या तलकर खाते रहते हैं। साथ में जिस ब्रेड का सहारा वे लेते हैं वह भी खमीर के प्रयोग के कारण पौष्टिक नहीं होती। मसालों में नमक और काली मिर्च के सिवाय कुछ चलन में नहीं है। पिछले कुछ वर्षों से सलाद पर विशेष जोर दिया जाने लगा है। डॉक्टरों ने कुछ ऐसा समझा दिया है कि सलाद में अमृत होता है। वास्तविकता तो यह है कि कच्ची या अधपकी वस्तुएं पेट के लिए गुणकारी होने के बजाय हानिकारक होती है, परन्तु बीसवीं सदी में भी हमारे देश में सलाद, फैशन की चीज बन गया है। शादी-ब्याह, जीमण में सलाद की विशेष व्यवस्था की जाती है। शरीर के लिए तो अधपका अन्न, अधपकी या कच्ची सब्जियां सभी हानिकारक हैं। राजस्थान के मरुस्थली भागों में हरी सब्जियों का रिवाज कभी नहीं रहा। लेकिन उधर के रहने वालों का जीव आज भी देखिए, सबसे ज्यादा है। लम्बे-चौड़े कद, चौड़ी छाती, हट्टा-कट्टा बदन और लम्बी उम्र। जो लोग मोटर, टेलीविजन, टेलीफोन इत्यादि को क्वालिटी ऑफ लाइफ का प्रतीक मानते हैं, इनसे मुकाबला करें। यूरोप में भी लोग इन दिनों नैसर्गिक आहार की आवश्यकता को महसूस करने लगे हैं। रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाइयों और डिब्बा बंद खान-पान से लोग ऊबने लगे हैं और दु:खी भी हैं।

भोजन शैली में षड्व्यंजन आधार

भारतीय भोजन की विधि का एक रूप यह है कि उसमें सद्यता अथवा ताजगी पर विशेष ध्यान दिया गया। हमारी भोजन शैली में षड्व्यंजन को आधार बनाया गया है। सामान्य भोजन में भी रस-रसायन का समावेश देखने में आएगा। यह आवश्यक नहीं कि धनवान व्यक्तियों के लिए ही षड्व्यंजन उपलब्ध हों। अन्न के विषय में शास्त्र भरे हुए हैं परन्तु व्यवहार में बहुत-कुछ देखा जा सकता है। भारतीय जीवन शैली भौगोलिक सीमा तक बद्ध नहीं है। वह मानव मात्र के लिए हितकर है। वह सार्वभौम है, सर्वजनीन है और मंगलमयी है। यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका आदि देश भारतीय जीवन शैली की परिधि में ही आते हैं। भले ही भौगोलिक अवस्था के कारण तनिक भेद हो गया हो। किसी समय भारतीय जीवन शैली यूरोप व दक्षिण पूर्वी एशिया में व्याप्त थी।

मौसम सारू…

मौसम सारू जीमणूँ,
रस की परख रसाण।
साँझ-सुँवारे नित् नया,
बदल जाय पकवान।।

('सात सैंकड़ा' से)

खत्म हुआ जमीन पर जीमण का रिवाज

अब चूंकि आबादी बढ़ गई है और कुछ लोगों के पास पैसा भी बहुत हो गया, जमीन पर जीमण का रिवाज खत्म हो गया या सिमट गया। सफेदपोशी भी बढ़ गई, इसलिए अब जमीन पर बैठकर खाना किसी को सुहाता नहीं। जमीन भी ऐसी अब कहीं नहीं है कि आप बैठकर खाना पसंद कर सकें। एक जमाना वह था कि सड़क पर गाय-बैल ने गोबर या घोड़े ने लीद कर दी तो वह जमीन पर गिरने के साथ उठा ली जाती थी। अब तो घरों का कूड़ा-कचरा सड़कों पर फेंका जाता है और नालियां नरक बनी हुई हैं।