
फाइल फोटो
Caste Census in India: देश में आजादी के बाद पहली बार जातिगत जनगणना कराई जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई कैबिनेट की बैठक में यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने प्रेस वार्ता में जानकारी देते हुए बताया कि जातिगत आंकड़े अब मूल जनगणना का हिस्सा होंगे, जिसे सितंबर 2025 से शुरू किए जाने की संभावना है।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस फैसले को लेकर कहा कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सामाजिक न्याय के लिए लगातार जातिगत जनगणना की मांग कर रहे थे। पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने कहा कि देश का वास्तविक विकास, समावेशी विकास तभी हो सकता है जब दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और शोषितों को विकास में वैज्ञानिक तरीके से हिस्सेदारी मिलेगी इसलिए राहुल गांधी जातिगत जनगणना पर लगातार जोर दे रहे थे।
उन्होंने कहा कि आज मोदी सरकार की कैबिनेट को भी इस मांग पर मुहर लगानी पड़ी। अब 1931 के बाद करीब 94 साल बाद जातिगत जनगणना होगी।
जातिगत जनगणना का अर्थ है- देश की कुल आबादी में किस जाति के कितने लोग हैं, इसका विस्तृत और प्रमाणिक आंकड़ा इकट्ठा करना। यह आंकड़े सरकार को नीतियां बनाने, आरक्षण, सामाजिक योजनाओं, संसाधनों के वितरण और प्रतिनिधित्व में संतुलन लाने में मदद करते हैं। भारत में अंतिम बार 1931 में जातिगत जनगणना हुई थी। उसके बाद केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आंकड़े लिए जाते रहे हैं, जबकि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और बाकी जातियों के सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
गौरतलब है कि जातिगत जनगणना को लेकर कांग्रेस, RJD, SP, BSP, NCP, BJD समेत तमाम विपक्षी दल लंबे समय से आवाज़ उठा रहे थे। राहुल गांधी ने अपनी लगभग हर जनसभा में कहा था कि हमारी सरकार बनी तो 50% आरक्षण की सीमा हटाकर, आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिलवाया जाएगा। कांग्रेस का तर्क है कि जब तक जनसंख्या के अनुपात में जातीय प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा, तब तक समानता का सपना अधूरा रहेगा।
सरकार ने संकेत दिए हैं कि जनगणना सितंबर 2025 से शुरू हो सकती है, जिसे पूरा होने में करीब एक साल का समय लगेगा। इस आधार पर अंतिम आंकड़े 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत में जारी किए जा सकते हैं। गौरतलब है कि पिछली जनगणना 2011 में हुई थी, और 2021 में कोविड-19 के कारण जनगणना स्थगित कर दी गई थी।
जातिगत जनगणना से सरकार को देश में जाति-आधारित वास्तविक सामाजिक और आर्थिक स्थिति का डेटा मिलेगा। इससे भविष्य में नीतियों का निर्धारण, आरक्षण की सीमा पर पुनर्विचार, शैक्षणिक व रोजगार अवसरों में संतुलन जैसे अहम विषयों पर निर्णय लेना संभव होगा। यह OBC, SC, ST, और अन्य वंचित तबकों के लिए प्रतिनिधित्व और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण का आधार बन सकती है।
Published on:
30 Apr 2025 07:00 pm
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