
जयपुर। कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई अब अंतिम मुकाम पर है। कांग्रेस में सर्वमान्य नेतृत्व की धुरी अब इस पर टिकी है कि विधानसभा चुनाव में कौन उतरेगा और कौन नहीं। सचिन पायलट और अशोक गहलोत के नजदीकी कार्यकर्ता अब इसी उधेडबुन में हैं। दोनों खेमों का एक लक्ष्य है कैसे चुनाव में दूसरे पर पार पाई जाए।
हालांकि पायलट और गहलोत दोनों ने स्वयं अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि वे चुनाव में उतरेंगे या नहीं। दोनों का पक्ष साफ है कि यदि पार्टी चुनाव में उतारेगी तो वह लडेंगे। अन्यथा पार्टी को जिताने में भूमिका निभाएंगे। समर्थकों की माने तो यह तय है कि यदि गहलोत चुनाव में उतरे तो पायलट भी जरूर लडेंगे। और पायलट चुनाव लडे तो गहलोत भी पीछे नहीं हटेंगे।
उधर, राहुल गांधी की अध्यक्षता में केन्द्रीय चुनाव समिति की बैठक के बाद स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष कुमारी शैलजा ने एक सवाल के जवाब में साफ कहा कि राजस्थान में सभी सीटों पर सभी नेताओं के चुनाव लड़ाने पर विचार किया जा रहा है। हालांकि अभी कुछ भी फाइनल नहीं हुआ है।
पायलट और गहलोत दोनों खेमे जानते हैं कि विधायक दल की बैठक में उसकी चलेगी जो उसमें मौजूद रहेगा। मुख्यमंत्री कौन होगा इसका निर्णय पार्टी आलाकमान विधायक दल की बैठक से मिले फीडबैक के आधार पर करेंगे। बैठक में बैठ वही सकता है जो निर्वाचित होकर आए। हालांकि पायलट प्रदेशाध्यक्ष हैं, ऐसे में उनके लिए विधायक दल की बैठक में बैठना मुश्किल नहीं होगा।
गहलोत समर्थकों का मानना है कि पायलट की विधायक दल की बैठक में मौजूगी उनके निर्णय को प्रभावित कर सकती है। वह यह भी जानते हैं कि गहलोत चुनाव नहीं लडे तो अकेले राष्ट्रीय महासचिव के बूते उनका इस बैठक में मौजूद होना आसान नहीं होगा। ऐसे में गहलोत खेमे का तर्क है कि सरदारपुरा उनकी परम्परागत सीट है। विपरित हालात में भी उन्होंने चुनौती पर फतह हासिल की है। अत: गहलोत को इसी सीट से फिर चुनाव में उतारा जाना चाहिए।
पायलट खेमा दो राय में बंटा नजर आता है। पायलट खेमे का एक धडा उनके चुनाव में उतरने का पक्षधर है जबकि दूसरे धडे का मानना है कि संगठन को एकजुट रखने के लिए जरूरी है कि वह किसी एक सीट से चुनाव लडने की जगह सभी 200 विधानसभा सीट पर सक्रिय रहें। पहले धडे की राय में गहलोत चुनाव नहीं लडते तो पायलट चुनाव में उतरने के साथ ही राज्य में कांग्रेस के चेहरे के रूप में स्थापित हो जाएंगे। अत: गहलोत को चुनाव लड़ने से रोककर पायलट को किसी सुरक्षित सीट से उतारा जाना चाहिए।
इसके लिए अजमेर, करौली, दौसा, भीलवाड़ा में 9 सीट भी चिन्हित कर रखी हैं। वहीं गहलोत समर्थक भी चाहते हैं कि पायलट भी चुनाव में उतरें। ताकि किसी एक सीट पर उनकी घेराबंदी की जा सके। हालांकि दोनों ही खेमों को हार-जीत का डर भी सता रहा है। चूंकि कार्यकर्ता 2008 में सी.पी. जोशी की हार देख चुके हैं। जब वह महज एक वोट से हारकर मुख्यमंत्री की दौड से बाहर हो गए थे।
हालांकि हार के बाद भी विधायक दल की बैठक में उनका नाम मुख्यमंत्री के तौर पर उछाला गया था लेकिन उनके नाम पर सर्वसम्मति नहीं बन सके और गहलोत मुख्यमंत्री चुन लिए गए। इन सबके बीच आम कार्यकर्ता की सुनें तो वे नहीं चाहते कि कांग्रेस के यह दोनों बडे नेता चुनाव में उतरें। आम कार्यकर्ता की नजर में अब दोनों ही सर्वमान्य नेता हैं। अत: दोनों को किसी एक सीट से चुनाव लडने की बजाय पूरे राज्य में घूमकर कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करनी चाहिए। कांग्रेस की जीत के बाद केन्द्रीय नेतृत्व जिसे चाहे उसे राज्य की कमान सौंप दे।
Updated on:
03 Nov 2018 08:13 am
Published on:
03 Nov 2018 08:12 am
