
औषधीय गुणों वाल यह पौधा बढ़ाएगा आमदनी
जयपुर
Cultivation of medicinal plants : किसान अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए औषधीय पौधों की खेती में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं। औषधीय पौधों की खेती करने में दोहरा फायदा है। एक तो इनकी मांग बाजार में लगातार बनी रहती है, दूसरा इनके दाम भी अच्छे मिल जाते हैं। ऐसे में किसान आंवला की खेती करने में रूचि ले रहे हैं। दरअसल, आंवला एक फल देने वाला वृक्ष है। यह करीब 20 फीट से 25 फीट लम्बा और झाड़ीदार होता है। भारत की जलवायु आंवले की खेती के अनुकूल होने से कई राज्यों में अच्छे खासे एरिया में आंवले की खेती की जाती है। देश में खासतौर पर आंवले की खेती करने में उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, तमिलनायडु, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाण, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तराखण्ड, अरूणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश का नाम आता है। भारत में उत्तर प्रदेश राज्य में सबसे ज्यादा आंवलें की खेती होती है। यूपी में प्रतापगढ़ स्थान आंवले की खेती के लिए फेमस है। दरअसलख्आं वला उष्ण जलवायु का पौधा होता है। आंवले की खेती शुष्क के साथ ही उपोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में भी आसानी से सफलतापूर्वक की जा सकती है।
भारत पहले नंबर पर
महत्वपूर्ण औषधीय गुणों से युक्त होने के कारण बाजार में सालभर आंवले के फ्रूट की मांग बनी रहती है। दुनिया की बात करें तो गुणकारी आंवले के उत्पादन में भारत विश्व में पहले स्थान पर है। भारत में उत्तरप्रदेश में सबसे ज्यादा पैदावार और उत्पादन होता है। आंवले को आयुर्वेद में अत्याधिक स्वास्थवर्धक माना गया। आंवले में विटामिन-सी की अच्छी मात्रा में पाई जाती है और यह विटामिन सी का प्राकृतिक स्त्रोत है। इसमें मौजूद विटामिन सी नष्ट नहीं होता है।
कम बारिश में भी खेती
आंवले की खेती की बात करें तो इसकी खेती बलुई भूमि के अतिरिक्त सभी प्रकार की मिट्टी में आसानी से की जा सकती है। अगर काली जलोढ़ मिट्टी हो तो यह और भी ज्यादा उपयुक्त रहती है। जिन स्थानों पर बारिश कम होती है, जहां की भूमि का पीएच मान 9 तक होता है। वहां आंवले की अच्छी खेती की जा सकती है। आंवले के पौधे रोपन करने के लिए जून का समय अच्छा माना जाता है। जून में 8-10 मीटर की दूरी पर 0.25 -0.30 मीटर के गड्ढा खोदकर आंवले के पौधे लगाने चाहिए। पौधों को वर्गाकार विधि में लगाना ज्यादा अच्छा माना जाता है।
इन बातों का रखें ध्यान
गढ्ढ़े की भराई के समय गोबर की सड़ी खाद, नीम की खली का मिश्रण और गढ्ढ़े से निकाली हुई मिट्टी को मिलाकर कुछ ऊंचाई तक भरकर चाहिए। फिर पानी डालना चाहिए ताकि गढ्ढ़े की मिट्टी अच्छी तरह से बैठ जाए। इन्हीं गड्ढों मे जुलाई से सितम्बर के बीच में या फिर उचित सिंचाई की व्यवस्था होने पर जनवरी से मार्च के बीच में पौधे रोपण का कार्य किया जाता है। जनवरी से मार्च के बीच लगाए गए पौधे से आंवलों का अच्छा उत्पादन होता है। आंवले की व्यवसायिक तौर पर खेती के दौरान यह ध्याान रखना चाहिए कि पौधे और फल को संक्रमण से रोका जाए। शुरूआती दिनों में इनमें लगे कीड़ों और उनके लार्वे को हाथ से हटाया जा सकता है। लेकिन इसकी अधिकता होने पर पोटेशियम सल्फाइट का छिड़काव करके कीटाणुओं और फफूंदियों की रोकथाम की जा सकती है।
Published on:
15 Jan 2020 06:05 pm
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