जितेन्द्र सिंह शेखावत
जयपुर। सूखे
सावन और महंगाई की मार ने इस मानसून में दाल-बाटी-चूरमा की गोठ का मजा किरकिरा कर
दिया है। गोठ के लिए रसोई तैयार करने वाले हलवाई और कारीगर काम नहीं मिलने से
परेशान हैं। जौहरी बाजार की हलवाई मजदूर मंडी में आने वाले कारीगरों को गोठ की रसोई
बनाने के लिए पहले जितने आर्डर नहीं मिल रहे हैं। रोजाना सैकड़ों कारीगर मंडी में
आते हैं और काम नहीं मिलने पर मायूस होकर वापस लौट जाते हैं।
गोठ का खाना बनाने
वाले कारीगरों ने बताया कि इस बार सावन में गोठों का अकाल सा पड़ गया है। सावन के
चार सोमवार सूखे निकल गए। यह पहला मौका है जब बड़ी गोठ तो दूर मंदिरों में भी
दाल-बाटी-चूरमा की सवामणी के आयोजन कम हो रहे हैं। मानसून आने से पहले ही गोठों की
एडवांस बुकिंग हो जाती थी, इस बार ऎसा नहीं हुआ। मौसम की बेरूखी के साथ इस बार
महंगाई भी पिछले साल से दुगनी से ज्यादा हो गई है। पहले एक व्यक्ति की थाली 80 से
125 रूपए तक तैयार हो जाती थी। अब 175 से 225 रूपए तक तैयार होती है।
इस
साल मूंग दाल का भाव 65 से बढ़कर 120 रूपए किलो, बेसन 40 से बढ़कर 70 रूपए किलो,
देशी घी का एक पीपा 3900 से 4600 रूपए और तेल का पीपा 1100 से बढ़कर 1500 रूपए हो
गया। मिर्च-मसालों की दर भी तीस प्रतिशत बढ़ गई है।
लल्लू राम, उपाध्यक्ष, हलवाई
कैटर्स कल्याण समिति
इस बार अच्छा काम मिलने की उम्मीद थी। सोचा था पुराना
कर्जा भी चुका देंगे, लेकिन अब तो घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। इस बार के
ढीले मानसून ने हमारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
राम सहाय मीणा, सचिव,
हलवाई कैटर्स कल्याण समिति