
'रेगिस्तान का जहाज के अस्तित्व पर खतरा
राज्यपशु ऊंट को रखने की सरकार के पास जगह नहीं, संख्या घटते-घटते 1951 वाली स्थिति में आ गई
जयपुर. रेगिस्तान का जहाज कहा जाने वाला ऊंट राजस्थान का राज्यपशु है लेकिन राज्य सरकार के पास ऊंटों को रखने के लिए जगह तक नहीं है। यहां तक कि तस्करी मामलों में पकड़े गए ऊंटों को भी स्वयंसेवी संस्थाओं को सौंपना पड़ रहा है। ऐसे में ऊंटों की संख्या घटते-घटते उतनी रह गई है, जितनी वर्ष 1951 में थी।
पशुगणना रिपोर्ट के अनुसार ऊंटों की संख्या पिछले 20 वर्षों से लगातार घट रही है। वर्ष 1951 में राज्य में 3.4 लाख ऊंट थे। लगातार बढ़त के साथ 1983 में यह संख्या 7.56 लाख तक पहुंच गई लेकिन इसके बाद गिरावट शुरू हो गई। साल-दर-साल घटे ऊंट वर्ष 2012 में वापस 3.26 लाख ही रह गए। आंकड़ों के मुताबिक 2007 से 2012 के मध्य राज्य के बाड़मेर, हनुमानगढ़, जयपुर, झुंझुनूं, सीकर, टोंक, उदयपुर, अलवर और दौसा जिलों में ऊंटों की संख्या घटकर आधी रह गई।
अधिनियम के बावजूद तस्करी जारी
सरकार ने ऊंट को राज्यपशु घोषित कर 4 साल पहले अधिनियम लागू किया। इसके तहत पलायन, तस्करी पर रोक लेकिन तस्करी का सिलसिला थमा नहीं है। सिरोही में ऊंटों से जुड़ी एक संस्था के सचिव अमित दिओल की मानें तो पिछले कुछ वर्षों बाड़मेर सहित तेलंगाना, हैदराबाद, दिल्ली, उत्तरप्रदेश आदि स्थानों पर पकड़े गए तस्करी के मामलों में 545 ऊंट छुड़ाकर लाए गए। सरकार के पास जगह नहीं होने के कारण इन्हें शपथ पत्र लेकर पशुपालकों को सौंपा गया, टैग भी लगाए गए। ऐसे ऊंटों को पशुपालन विभाग और ग्राम पंचायत की देखरेख में रखा जाता है।
बढ़ रही चिन्ता
ऊंटों की घटती संख्या से चिंतित सरकार ने 2 अक्टूबर 2016 को ऊष्ट्र प्रजनन प्रोत्साहन योजना शुरू कर 3 किस्तों में ऊंटपालकों को आर्थिक सहायता देना शुरू किया। तकनीक के उपयोग, संतुलित आहार, बेहतर प्रबंधन एवं प्रजनन आदि विषयों पर राष्ट्रीय ऊष्ट्र अनुसंधान केंद्र बीकानेर के जरिए ऊंटपालकों को 3 दिवसीय प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। ऊंटों में सर्रा रोग नियंत्रण के लिए सर्रा नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया।
राज्य में पहले बढ़े, फिर घटते गए ऊंट
वर्ष --- ऊंट
1951 --- 3.4 लाख
1956 --- 4.36 लाख
1961 --- 5.7 लाख
1966 --- 6.54 लाख
1972 --- 7.45 लाख
1977 --- 7.52 लाख
1983 --- 7.56 लाख
1988 --- 7.19 लाख
1992 --- 7.46 लाख
1997 --- 6.69 लाख
2003 --- 4.98 लाख
2007 --- 4.22 लाख
2012 --- 3.26 लाख
एक्सपर्ट व्यू... सब्सिडी बढ़े, दूध का प्रचार हो
कृषि व परिवहन में उपयोग कम होने, चराई आदि की समस्या के कारण ऊंटपालक रुचि नहीं लेते। संख्या घटने का दूसरा बड़ा कारण तस्करी है। बाड़मेर, जैसलमेर, अलवर, भरतपुर आदि इलाकों से तस्करी बढ़ रही है। बांग्लादेश भेजकर तस्कर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। सर्वाधिक तस्करी पशुमेलों में होती है। मेलों के दौरान इनके परिवहन की अनुमति मिल जाती है। सरकार को सब्सिडी बढ़ानी चाहिए। ऊंट के दूध का भी प्रचार-प्रसार होना चाहिए।
हनुमंत सिंह राठौड़, पाली
विभाग के पास ऊंटों के रखरखाव के लिए कोई बजट या जगह नहीं है। तस्करी की सूचना मिलती है तो सादड़ी में स्वयंसेवी संस्था को ट्रांसफर करते हैं।
- डॉ. अजय गुप्ता, निदेशक, पशुपाल
Published on:
27 Aug 2018 08:38 pm
बड़ी खबरें
View Allजयपुर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
