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कौन है राजस्थान की 8 साल की Devanshi Sanghvi जो करोड़ों की दौलत छोड़कर बन गई साध्वी

Who Is Devanshi Sanghvi: राजस्थान के सिरोही जिले के मालगांव की हीरा व्यवसायी परिवार की 8 वर्ष की बालिका देवांशी ने बुधवार को भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर जैन साध्वी के तौर पर दीक्षा ली।

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Who Is Devanshi Sanghvi: राजस्थान के सिरोही जिले के मालगांव की हीरा व्यवसायी परिवार की 8 वर्ष की बालिका देवांशी ने बुधवार को भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर जैन साध्वी के तौर पर दीक्षा ली। दीक्षा लेने के बाद देवांशी का नाम अब दिगंध प्रज्ञना श्रीजी हो गया है। देवांशी के दीक्षा दानम् महोत्सव के साक्षी बनने के लिए गुजरात के सूरत में 35 हजार से अधिक लोग मौजूद थे। देवांशी कई साधु-साध्वियों की मौजूदगी में आचार्य कीर्तियश सुरीश्वर महाराज के हाथों रजोहरण ग्रहण कर संयम मार्ग की पथिक बन गई।

राजस्थान से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे:
नन्‍हीं सी देवांशी के दीक्षा दानम महोत्सव के साक्षी बनने के लिए राजस्थान से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। देवांशी के साध्‍वी बनने पर जहां लोग हैरान हैं, वहीं धर्म के लिए किए गए सांसरिक सुख के त्‍याग को देखकर लोग देवांशी को प्रणाम कर रहे हैं। वहीं साध्‍वी बनने के बाद विदा करते समय उनका परिवार भावुक हो गया। नम आंखों से माता-पिता ने अपनी बेटी को हंसते हुए धर्म के रास्‍ते पर चलने के लिए विदा किया। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है।

हीरा व्यवसायी धनेश संघवी की बेटी है देवांशी:

सालाना सौ करोड़ के टर्नओवर वाले हीरा व्यवसायी धनेश संघवी की बेटी देवांशी मोबाइल-टीवी से सदैव दूर रही। उसने कभी भी अक्षर लिखे हुए कपड़े नहीं पहने। देवांशी को वैराग्य शतक और तत्त्वार्थ के अध्याय जैसे कई महाग्रंथ कंठस्थ हैं। देवांशी संघवी भेरूतारक तीर्थ धाम के संस्थापक संघवी भेरमल हकमाजी के परिवार के संघवी मोहन भाई की पौत्री व संघवी धनेश-अमी बेन की पुत्री है।

पांच भाषाएं जानती है देवांशी:

देवांशी ने 8 वर्ष तक की आयु में 357 दीक्षा दर्शन, 500 किमी पैदल विहार, तीर्थों की यात्रा व जैन ग्रन्थों का वाचन कर तत्व ज्ञान को समझा। देवांशी के माता-पिता अमी बेन धनेश भाई संघवी ने बताया कि बालिका ने कभी टीवी नहीं देखा। देवांशी ने क्विज में गोल्ड मेडल जीता था। संगीत में सभी राग में गाना, स्केंटिग भरतनाट्यम, योगा सीखा। देवांशी संस्कृत, हिन्दी, गुजराती, मारवाड़ी और अंग्रेजी भाषाएं जानती है।

7 वर्ष की आयु में पौषध व्रत शुरू किया:

देवांशी ने 4 वर्ष 3 माह की उम्र में हर महीने 10 दिन गुरु भगवंतों के साथ रहना शुरू किया। उस समय 37 दीक्षा, 13 बड़ी दीक्षा, 4 आचार्य पदवी में 250 साधु-साध्वी भगवंतों का गुरु पूजन किया। 4 वर्ष 5 माह में कर्मग्रन्थ व ह्रदय प्रदीप ग्रन्थ का वाचन शुरू किया। 5 वर्ष की आयु में दीक्षा विधि कंठस्थ की, 5 वर्ष 8 माह की आयु में आराधना शुरू की। 5 वर्ष 4 माह की आयु में एक ही दिन में 8 सामायिक, 2 प्रतिक्रमण व एकासणा शुरू किया और 7 वर्ष की आयु में पौषध व्रत शुरू किया।

4 माह की हुई तो रात्रि भोजन त्यागा:

इस बालिका का जन्म होने पर नवकार महामंत्र का श्रवण कराने के साथ ओगे का दर्शन कराया गया था। बालिका महज 25 दिन की थी, तब नवकारशी का पच्चखाण लेना शुरू किया। जब 4 माह की हुई तो रात्रि भोजन का त्याग शुरू किया। जब 8 माह की थी तो रोज त्रिकाल पूजन की शुरुआत की। एक वर्ष की होने पर रोजाना नवकार मंत्र का जाप शुरू कर दिया। एक वर्ष 3 माह में 58 दिन की आयु में दीक्षा स्वीकार दर्शन किए।