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Patrika Book Fair: स्कूली पाठ्यक्रम में हो मीडिया लिटरेसी- डॉ. प्रभात दीक्षित

Patrika Book Fair 2025: एआइ का उपयोग केवल साहित्य में ही नहीं, बल्कि हर डोमेन में हो रहा है

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जयपुर

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Alfiya Khan

Feb 20, 2025

PATRIKA BOK FAIR

जयपुर। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में बच्चों को यह बताना बेहद जरूरी है कि, कौन-सा कंटेंट सही है और कौन-सा गलत। इसके लिए आवश्यक है कि, मीडिया लिटरेसी को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। साथ ही, सरकार को भी इसके लिए नीति बनाने की जरूरत है।

यह कहना है डॉ. प्रभात दीक्षित का, जो बुधवार को जवाहर कला केंद्र के शिल्पग्राम में चल रहे पत्रिका बुक फेयर में ‘द वर्ल्ड ऑफ एआइ एंड लिटरेचर’ विषय पर चर्चा कर रही थीं। सोशल मीडिया पर साहित्य के नाम पर पिछले कुछ समय से जो कंटेंट गढ़ा जा रहा है, उसमें मौलिकता की पहचान करना किसी चुनौती से कम नहीं है। देखने में आया है कि, कई जानी-मानी हस्तियों को खुद यह सफाई देनी पड़ी है कि जो कंटेंट सोशल मीडिया पर उनके नाम से पोस्ट हो रहा है, वह उनका लिखा हुआ नहीं है। इसके लिए नीति बनाए जाने की जरूरत है, जिससे लोग फेक और ऑरिजनल कंटेंट में फर्क को समझ सकें।

साहित्य में एआइ के फायदों पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यह हमें राइटिंग पैटर्न को समझने में मदद करता है और लेखन शैली को विकसित करने में भी सहायक है। यह शब्द-दर-शब्द अनुवाद करने में कारगर है, लेकिन इसमें मानवीय मूल्यों का अभाव है। हो सकता है कि, भविष्य में एआइ ऐसा कर सके, लेकिन फिलहाल यह संभव नहीं है।

डॉ. दीक्षित का कहना था कि, एआइ का उपयोग केवल साहित्य में ही नहीं, बल्कि हर डोमेन में हो रहा है, लेकिन यह समझना आवश्यक है कि साहित्य केवल शब्द नहीं है, उसमें मानवीय मूल्य, सामाजिक और सांस्कृतिक समझ भी होती है, जो एआइ में नहीं होती। ऐसे में हमें स्वविवेक से काम करने की जरूरत है।

यह सही है कि एआइ ने कई चीजें आसान की हैं, लेकिन जो नहीं लिखा है, उसे भी पढ़े जाने की जरूरत है। इसलिए कहा जाता है ‘रीड बिटवीन द लाइन्स’ और यह काम एआइ नहीं कर सकता। आज जो कुछ हमें मिल रहा है, वह केवल ज्ञान नहीं है, उसमें अपनी समझ, अपनी जानकारी और अपना संदर्भ डालना भी जरूरी है, फिर जो निकलेगा, वही सही होगा।

एआइ को एक टूल की तरह समझने की जरूरत है और इसे सब कुछ समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। उनका कहना है कि, हमें एआइ को रेगुलेट करने की जरूरत है, कहीं ऐसा न हो कि वह हमें ही रेगुलेट करना आरंभ कर दे। अब तक जो भी आविष्कार हुए हैं, वे मानवीयता को सुदृढ़ करने के लिए हुए हैं, लेकिन जब बात एआइ की आती है, तो यह कहीं न कहीं हमारे समानांतर खड़ा हो रहा है, जबकि यह केवल वही गढ़ता है, जो उसमें फीड किया गया है।

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