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विकास की आपा धापी में न जाने कहां खो गया गोठ-घूघरी का नगर

जयपुर. जयपुर की स्थापना के साथ ही हर साल शहर में धीरे-धीरे बदलाव आते गए। विकास की डगर पर आगे बढ़ते शहर में गोठ-घूघरी का दौर पीछे छूट गया। शहर की स्थापना के बाद से अब तक क्या-क्या बदलाव नजर आए, कई बुजुर्गों से चर्चा कर राजस्थान पत्रिका ने रोचक बातों को जाना।

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विकास की आपा धापी में न जाने कहां खो गया गोठ-घूघरी का नगर

विकास की आपा धापी में न जाने कहां खो गया गोठ-घूघरी का नगर

साल बदलने के साथ सब बदलता गया
शहर स्थापना के समय आमेर में विस्थापित हुए 70 वर्षीय इंद्रसिंह कुदरत ने बताया कि सुबह मंदिर के घंटे-घडिय़ालों, मस्जिद की अजान व गुरुद्वारों की गुरुवाणी के साथ दिन की शुरुआत होती थी। मंदिर जाने वाले लोग शहर से गुजरते हुए राम धुनी गाते हुए निकलते थे। वहीं, पक्षियों की चहचहाहट भी सुनाई देती थी। उस समय बाजार-सब्जी मंडी की जगह खेतों से सब्जी लाई जाती थी। पढ़ाई के लिए बच्चे जोशी जी के मदरसे में जाते थे। सड़कों पर पैदल आवाजाही के साथ ही बैलगाडिय़ां ही नजर आती थीं। कम पैसे में पूरे महीने का खर्च निकल जाता था। आज यह सब कई गुना बढ़ गया।
-इंद्रसिंह कुदरत, शिल्पकार
सौंदर्यीकरण को लग गई नजर
&करीब 300 साल पहले नक्शा बनाने के बाद शहर की नींव रखी गई तथा अष्टसिद्धि और नवनिधि के स्वरूप में पूरे शहर को बसाया गया। उस विरासत को बरकरार रखने के लिए परकोटे के दोनों ओर पांच-पांच मीटर का परिक्रमा मार्ग बना दिया जाए तो यह योगदान यादगार होगा। आज परकोटे का सौंदर्यीकरण पूरी तरह बिगड़ गया है। 1876 में सबसे पहले शहर में गुलाबी रंग हुआ था। आजकल हर साल गुलाबी रंग हो रहा है, जो कि कहीं भी एक जैसा नहीं है। तब पुराने शहर में जाली झरोखे व कंगूरे अच्छे थे। रास्ते में बग्गियां नजर आती थीं।
-सियाशरण लश्करी, संस्थापक अध्यक्ष जयपुर फाउंडेशन
हर दम रहता था मेले सा माहौल
&शहर को बसाने का पूरा श्रेय पूर्व महाराजा जयसिंह को जाता है। जिन्होंने अपना जीवन धर्मयात्रा में बिताया। देशभर के विद्वानों, वास्तुशास्त्रियों व पंडितों की मदद से प्राकृतिक आपदा से मुक्त नगर को नक्शे पर बसाया। उस दौर में परकोटा देश की शान हुआ करता था। तब जगह-जगह मेले सा माहौल नजर आता था, लेकिन अब यह शान बढ़ते निर्माण कार्यों के चलते कम होती हुई नजर आती थी। तीज और गणगौर पूर प्रदेश की सांस्कृतिक छटा को करीब से देखने के लिए दूर-दराज के इलाकों से लोग बैलगाडिय़ों में आते थे। तब जगह-जगह घाट हुआ करते थे।
-स्वामी सुदर्शनाचार्य, महंत घाट के बालाजी