विकास जैन
जयपुर. आप किसी सरकारी या निजी अस्पताल में बड़े डॉक्टर से गंभीर बीमारी का उपचार करवा रहे हैं तो थोड़ा सजग हो जाएं। कुछ बीमारियों के उपचार में दवाओं और जांच के लिए काम आनेवाली दवाओं के नाम पर मरीजों से सीधे कंपनी को ही डीडी और चेक के जरिये भुगतान करवाया जा रहा है। हैरत की बात यह है कि एेसे मामलों में डॉक्टर सीधे ही कंपनी या कंपनी के प्रतिनिधि से बात कर दवा मंगवाते हैं और फिर मरीज के परिजन उसका पैसा कंपनी को चुकाते हैं।
औषधि नियंत्रण संगठन के सूत्रों के अनुसार इस तरह बिना किसी प्रतिष्ठान या केन्द्र के दवा बिक्री करना सही नहीं है। कुछ दवाइयों की बिक्री डॉक्टर अपने यहां स्टोर पर कर सकते हैं। लेकिन उनके लिए भी एेसा करना स्टोर के जरिये ही संभव हो सकता है। हालांकि इस नियम को आड़ बनाकर राजधानी जयपुर में इसे धंधे में तब्दील करने की कोशिश बड़े पैमाने पर हो रही है।
डॉक्टर मंगवाए दवा तो शंका क्यों न हो
प्रोस्टेट कैंसर के एक मरीज ने निजी अस्पताल के एक डॉक्टर को दिखाया। मरीज ने डॉक्टर से पूछा कि दवाएं कहां से मिलेगी तो उसके जबाव में डॉक्टर ने कहा कि अभी व्यवस्था करा देता हूं। मरीज ने बताया कि हर बार डॉक्टर ही कंपनी के प्रतिनिधि को फोन करके मेरे लिए दवा मंगवाता है। और उन दवाओं का भुगतान भी वह एमआर सीधे ही ले जाता।
समझ नहीं आया क्या करें
एक बुजुर्ग मरीज सियाराम (परिवर्तित नाम) ने बताया कि उनसे एेसी दवा मंगवाई गई जो जांच के काम आती है। इसमे लगे विशेष कैमरे से मरीज की बीमारी का पता चलता है। इसके बाद मरीज से कंपनी के नाम डीडी बनवाया गया और कैप्सूल आ गया। परिजन इससे सकते में आ गए। वरिष्ठ नागरिक श्रेणी में अस्पताल में इसका उपचार नि:शुल्क हुआ। लेकिन इस कैप्सूल के नाम पर उसे भारी फटका लगा। जिसका किसी भी तरह का पुर्नभुगतान भी उसे होने की संभावना नहीं है।
प्रदेश में 3500 करोड़ का कारोबार
देश भर में सालाना दवा कारोबार की दिसंबर मंे जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल राजस्थान में करीब 3500 करोड़ का दवा कारोबार हुआ। जबकि देश भर में यह कारोबार करीब एक लाख करोड़ रुपए का हुआ।
कुछ की कीमत 25 हजार तक
मरीजों के अनुसार बाजार में दवा से बेहिसाब मुनाफे कमाने के कारोबार का सबको पता है। आमतौर पर दवा को लागत मूल्य से काफी अधिक कीमत पर बेचा जाता है। एेसे माहौल में अगर मरीज को स्टोर पर दवा न मिले और डॉक्टर की ओर दवा कंपनी को फोन करके दवा मंगवाए जाने से कंपनी और डॉक्टर के बीच कमीशन के खेल की आशंका को जन्म दे रही है। कंपनियों से डॉक्टर के कमीशन खाए जाने की वजह से मरीज की जेब पर 50 फीसदी तक का फटका लगने की आशंका जताई जा रही है। गौरतलब है कि एेसी दवाइयों की कीमत 25 हजार रुपए तक है।
सुपर स्पेशियलिटी विभागों में ज्यादा
दवा बाजार के अनुसार सुपर स्पेशियलिटी विभाग कैंसर, यूरोलॉजी, गेस्ट्रोएंट्रोलॉजी, प्लास्टिक सर्जरी, नेफ्रोलॉजी, न्यूरोलॉजी, मेडिसिन जैसे विभागों में इस तरह का काम अधिक होता है।
सभी डॉक्टर इस तरह का काम नहीं करते। कुछ सुपर स्पेशियलिटी के डॉक्टर एेसा करते हैं, जो गलत है। डॉक्टरों का काम परामर्श देना है। कंपनियों या एमआर से दवा मंगवाना ठीक बात नहीं है। इससे दवा कारोबार के साथ मरीजों का भी अहित होता है। अमरीश कौशिक, अध्यक्ष, जयपुर जिला केमिस्ट एसोसिएशन
डॉक्टर का काम उपचार करना है, दवा उपलब्ध कराना नहीं है। फिर भी यदि कोई डॉक्टर बाजार से कम कीमत पर किसी मरीज को दवा उपलब्ध करवाता है तो यह मरीज के हित में हो सकता है। अमूमन एेसा देखने में नहीं आता, हमारे पास इस तरह की कोई शिकायत भी नहीं आई। डॉ.यू.एस.अग्रवाल, प्राचार्य एवं नियंत्रक, एसएमएस मेडिकल कॉलेज