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संपादकीय: उच्च शिक्षा में लड़कों का घटता नामांकन चिंताजनक

बड़ी चिंता यह भी कि वर्ष 2017 में परिवार की मदद के लिए पढ़ाई छोडऩे वाले लड़के 58 प्रतिशत थे, जो बढ़कर 2024 में 72 फीसदी पर पहुंच गए हैं।

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हरिओम पंजवानी - उच्च शिक्षा व रोजगार में युवाओं की भागीदारी को लेकर जारी ताजा रिपोर्ट सचमुच चिंताजनक है। यह चिंता इसलिए भी है क्योंकि जिस उच्च शिक्षा को युवाओं के सपने को दिशा देने वाला माना जाता है। उसी को तिलांजलि देते हुए युवा आजीविका की कोई न कोई राह पकड़ रहे हैं। उच्च शिक्षा में लड़कियों के नामांकन में फर्क नहीं आया है लेकिन आमतौर पर परिवार की जिम्मेदारियां उठाने में आगे समझे जाने वाले लड़के उच्च शिक्षा में दाखिले के बजाय नौकरी या स्वरोजगार को प्राथमिकता दे रहे हैं। लड़कों की यह बढ़ती संख्या इस बात का संकेत है कि उन्होंने किसी न किसी मजबूरी में अपने सपनों का पीछा करना छोड़ दिया है।


अजीम प्रेमजी फाउंडेशन की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष २०१७ से २०२४ के बीच के महज सात वर्षों में उच्च शिक्षा में लड़कों का दाखिला ३८ से गिरकर ३४ फीसदी रह गया है। बड़ी चिंता यह भी कि वर्ष 2017 में परिवार की मदद के लिए पढ़ाई छोडऩे वाले लड़के 58 प्रतिशत थे, जो बढ़कर 2024 में 72 फीसदी पर पहुंच गए हैं। ये आंकड़े इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि जिस दौर में हर कोई सिर्फ पढ़ाई पर फोकस रखकर भविष्य के निर्माण पथ पर प्रगतिरत रहने की बात करता नजर आता है, उसी दौर में आज लड़के कॉलेज छोड़कर छोटी-मोटी नौकरी करने को प्राथमिकता देने में लगे हैं। परिवार की मदद करने व अपने पैरों पर खड़े होने का भाव आगे की पढ़ाई बीच में ही छोडऩे की वजह बनना स्वाभाविक है। लेकिन जाहिर है कि इसका असर उच्च शिक्षा में प्रवेश के आंकड़ों में कमी के रूप में परिलक्षित हो रहा है।

उच्च शिक्षा में दाखिले और परिवार की मदद करने के लिए पढ़ाई छोडऩे से जुड़े ये आंकड़े विकसित भारत का सपना पूरा करने में अवरोध ही कहे जाएंगे। यह प्रवृत्ति इसलिए नहीं बढ़ी कि लोगों को अच्छा खासा रोजगार उच्च शिक्षा पूरी किए बिना ही मिल रहा है। जो भी ऐसा कर रहे हैं, उन्हें छोटी-मोटी नौकरियां ही मिल रही हैं। जो खुद का रोजगार कर भी रहे हैं तो इनमें उन्हें सिर्फ जीवनयापन जितना ही पैसा मिल रहा है। शिक्षा अधूरी छोडऩे की प्रवृत्ति बढ़ रही है तो इसके लिए देश में रोजगार के अवसरों से जुड़ा परिदृश्य भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है। हमारे यहां नौकरियों की संख्या आशार्थियों की तुलना में काफी कम तो है ही पद व वेतनमान का ग्राफ भी नीचे है। ऐसे में बड़ी संख्या में लड़के अपेक्षा के अनुरूप प्रगति नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति उनमें उच्च शिक्षा पूर्ण करने के लिए उत्साह का संचार नहीं कर पाती।युवाओं के सपने पूरे हों और वे अपने लक्ष्य से विमुख नहीं हो इसके लिए नीति नियंताओं को व्यापक स्तर पर मशक्कत करनी होगी। विकसित भारत के लक्ष्य पथ के लिए निर्धारित शिक्षा व रोजगार के ढांचे की गहन समीक्षा करनी होगी। कमियों और विसंगतियों को दूर कर ऐसी व्यवस्था करनी होगी, जो युवाओं में व्यवस्था और उनके खुद के भविष्य के प्रति भरोसा जगा सके।