
एक्स गवर्नर की एक्टिव पॉलिटिक्स की पिच पर सेकंड इनिंग
आर्यन शर्मा/जयपुर. केरल के तिरुवनंतपुरम संसदीय क्षेत्र में तीसरे चरण में मंगलवार को मतदान होगा। यहां कांग्रेस के दो बार से सांसद शशि थरूर को टक्कर देने के लिए भाजपा के कुम्मनम राजशेखरन चुनाव मैदान में हैं। खास बात यह है कि राजशेखरन ने चुनाव लड़ने के लिए मिजोरम के राज्यपाल पद से इस्तीफा दिया और वह सक्रिय राजनीति में आ गए। वे करीब नौ माह ही राज्यपाल रहे थे। आमतौर पर यह माना जाता है कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर रहने के बाद नेताओं की सक्रिय राजनीति से विदाई हो जाती है। लेकिन ऐसा भी देखने में आया है कि कई बार संवैधानिक पद, खासकर राज्यपाल का पद छोड़ने के बाद नेता फिर से सक्रिय राजनीति में आ जाते हैं। हाल के वर्षों में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष शीला दीक्षित भी इसका बड़ा उदाहरण हैं। शीला के अलावा सुशील कुमार शिंदे, अर्जुन सिंह, निखिल कुमार, एस. एम. कृष्णा जैसे नेता भी राज्यपाल का पद छोडऩे के बाद फिर से सक्रिय राजनीति में आए।
फिर से मुख्य भूमिका में शीला
दिल्ली की लगातार तीन बार (1998-2013 तक) मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस को 2013 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद 11 मार्च 2014 को उन्हें केरल का राज्यपाल बना दिया, लेकिन उन्होंने करीब साढ़े पांच महीने बाद ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वह फिर से कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में लौट आईं। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से गठबंधन होने से पहले कांग्रेस ने उन्हें अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था। हालांकि यहां कांग्रेस-सपा गठबंधन को करारी हार मिली। इसके बाद शीला वापस से दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हो गईं। अभी वह दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर लोकसभा चुनाव की कमान संभाल रही हैं। शीला दीक्षित इस बार नॉर्थ ईस्ट दिल्ली से प्रत्याशी हैं। उनके सामने दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी मैदान में हैं। यानी यहां दोनों प्रमुख दलों के अध्यक्षों में मुकाबला है।
पद छोड़कर लड़ा चुनाव, लेकिन हार गए
दिल्ली पुलिस कमिश्नर और आइटीबीपी डीजी रहे निखिल कुमार सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में आए। वह चौदहवीं लोकसभा में बिहार के औरंगाबाद संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने। 2009 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। इसके बाद 15 अक्टूबर 2009 को उन्हें नगालैंड का राज्यपाल बनाया गया। वह 21 मार्च 2013 तक वहां के राज्यपाल रहे। 23 मार्च 2013 को उन्होंने केरल के राज्यपाल का पद संभाला, लेकिन करीब सालभर बाद 4 मार्च 2014 को उन्होंने औरंगाबाद सीट से लोकसभा चुनाव लडऩे के लिए पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि इस चुनाव में वह जीतने में कामयाब नहीं रहे।
राज्यपाल का पद संभाला, फिर गृह मंत्री भी बने
कांग्रेस नेता सुशील कुमार शिंदे ने वर्ष 2002 में राजग के प्रत्याशी भैरोंसिंह शेखावत के खिलाफ उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए। इसके बाद वह 18 जनवरी 2003 से 30 अक्टूबर तक 2004 तक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे। चार नवंबर 2004 से 29 जनवरी 2006 तक उन्होंने आंध्रप्रदेश के राज्यपाल का पद संभाला। राज्यपाल रहने के बाद वह दोबारा सक्रिय राजनीति में आ गए। शिंदे मनमोहन सिंह सरकार में पहले ऊर्जा मंत्री और फिर गृह मंत्री बने। हालांकि 2014 लोकसभा चुनाव में वह सोलापुर संसदीय क्षेत्र पर अपनी जीत को नहीं दोहरा पाए। इस बार भी वह सोलापुर से चुनाव मैदान में उतरे। यहां दूसरे चरण में मतदान हो चुका है।
कृष्णा का राजनीति चक्र
वर्ष 1999 से 2004 तक कांग्रेस से कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे एस. एम. कृष्णा 12 दिसंबर 2004 को महाराष्ट्र के राज्यपाल बने। पांच मार्च 2008 को कृष्णा ने कर्नाटक की सक्रिय राजनीति में लौटने के इरादे से पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वह राज्यसभा सदस्य बने और फिर 23 मई 2009 को मनमोहन सिंह सरकार में विदेश मंत्री बने, लेकिन 26 अक्टूबर 2012 को उन्होंने कर्नाटक की राजनीति में लौटने के लिए विदेश मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 2017 में उन्होंने कांग्रेस भी छोड़ दी, इसके बाद वह भाजपा से जुड़ गए और अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
अर्जुन ने लगाए सियासी तीर
कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश के तीन बार मुख्यमंत्री रहे। 1985 में उन्हें मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री से सीधे पंजाब का राज्यपाल बना दिया गया। वह 14 मार्च से 14 नवंबर 1985 तक राज्यपाल रहे। इसके बाद वह फिर से सक्रिय राजनीति में आ गए और 1988 तीसरी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। बाद में वह केंद्रीय मंत्रिमंडल में मानव संसाधन विकास मंत्री भी रहे।
दो बार लौटे सक्रिय राजनीति में
वर्ष 1980-81 तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे जगन्नाथ पहाडिय़ा को मार्च 1989 में बिहार का राज्यपाल बनाया गया था। करीब 11 माह राज्यपाल रहने के बाद वह फिर से सक्रिय राजनीति में आ गए। वे 1990 में कठूमर और 2003 में वैर विधानसभा सीट से विधायक बने। इसके बाद उन्होंने हरियाणा के राज्यपाल (2009-2014) का जिम्मा संभाला। राज्यपाल बनने के बाद वह फिर से सक्रिय राजनीति में आ गए। पहाडिय़ा अपने राजनीतिक कॅरियर में चार बार लोकसभा सांसद भी रहे हैं।
इन्होंने भी किया कमबैक
राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रहे हरिदेव जोशी भी राज्यपाल बनने के बाद सक्रिय राजनीति में लौटे। दो बार मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद 1989 में उन्हें असम और मेघालय का राज्यपाल बनाया गया, लेकिन कुछ महीने बाद ही उन्हें फिर से राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला।
Published on:
21 Apr 2019 08:59 pm
बड़ी खबरें
View Allजयपुर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
