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‘अनुकूल वेदना सुख और प्रतिकूल वेदना दुख

गीता ज्ञान यज्ञ के दौरान स्वामी सुबोधानन्द ने गीता के विभिन्न अध्यायों की व्याख्या की। साथ ही इनका दैनिक जीवन में उपयोग भी बताया।

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'अनुकूल वेदना सुख और प्रतिकूल वेदना दुख

'अनुकूल वेदना सुख और प्रतिकूल वेदना दुख

जयपुर. 'मनुष्य की जीने की इच्छा स्वाभाविक इच्छा है। हम सभी जीवन में रस चाहते हैं। नीरस जीवन नहीं चाहिए। चिन्मय मिशन तथा संस्कृत विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय की ओर से विवि. के मानविकी पीठ सभागार में आयोजित गीता ज्ञान यज्ञ के दौरान सोमवार को स्वामी सुबोधानन्द ने उक्त उद्गार व्यक्त किए। साथ ही उन्होंने गीता के 18वें अध्याय पर भी प्रवचन दिए।
इस मौके पर उन्होंने कहा कि महर्षि पतंजलि के अनुसार अनुकूल वेदना सुख और प्रतिकूल वेदना दुख है। वहीं, सुख तीन प्रकार का होता है। पहला सुख जो कछ साधक अनुभव करते हैं जिसमें चुने हुए लक्ष्य में निरंतर अभ्यास किया जाता है। फिर उस अभ्यास से हमारे भीतर आनन्द का स्त्रोत उत्पन्न होता है। अत: चुने हुए लक्ष्य प्राप्ति हेतु अभ्यास करते रहना चाहिये।
संस्कृत विभाग की निदेशक डॉ. सुनीता शर्मा एवं चिन्मय मिशन के अध्यक्ष एम एल गुप्ता ने बताया कि ज्ञान यज्ञ का अगला सत्र 12 से 15 फरवरी तक शाम 6.30 से 8 बजे तक होगा।