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जो मजा ‘काशी का अस्सी’ में, वह ‘मोहल्ला अस्सी’ में नहीं है

विवादों की आंच से निकलकर दर्शकों तक पहुंची निर्देशक चन्द्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म 'मोहल्ला अस्सी', बनारस में आस्था के नाम पर हावी हो रहे बाजारवाद, पाखंड और राजनीति पर करती है चोट

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जयपुर

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Aryan Sharma

Nov 16, 2018

Jaipur

जो मजा 'काशी का अस्सी' में, वह 'मोहल्ला अस्सी' में नहीं है

अडेप्टेशन, स्क्रीनप्ले एंड डायरेक्शन : चन्द्रप्रकाश द्विवेदी
स्टोरी एंड ओरिजिनल डायलॉग : काशी नाथ सिंह
म्यूजिक : अमोद भट्ट
सिनेमैटोग्राफी : विजय कुमार अरोड़ा
एडिटिंग : असीम सिन्हा
रेटिंग : 2.5 स्टार
रनिंग टाइम : 120.16 मिनट
स्टार कास्ट : सनी देओल, साक्षी तंवर, सौरभ शुक्ला, रवि किशन, मुकेश तिवारी, मिथिलेश चतुर्वेदी, राजेन्द्र गुप्ता, सीमा आजमी, फैजल रशीद, अखिलेन्द्र मिश्र, दयाशंकर पांडे

आर्यन शर्मा/जयपुर. इस देश में संसद दो ही जगह चलती है एक दिल्ली में और दूसरी अस्सी में पप्पू की चाय की दुकान पर। निर्देशक चन्द्रप्रकाश द्विवेदी की 'मोहल्ला अस्सी' का यह डायलॉग काफी हद तक इस मूवी के मिजाज को जाहिर कर देता है। काशी नाथ सिंह के उपन्यास पर आधारित यह फिल्म विवादों की आंच और ऑनलाइन लीक को झेलते हुए आखिरकार कई साल बाद सिनेमाघरों तक पहुंचने में कामयाब हुई है। इसकी कहानी ऐसे इंसान की है जो अपने सिद्धांतों पर जीता है। कहानी में मोहल्ला अस्सी निवासी धर्मनाथ पांडेय (सनी देओल) गंगा के घाट पर जजमानों को पूजा-पाठ कराता है और बच्चों को संस्कृत पढ़ाता है। इधर, अस्सी में बाजारवाद की बयार बहना शुरू हो गई है। लोग विदेशियों को संस्कृत की शिक्षा और कोठरी किराये पर देकर पैसा बटोरने में लगे हैं। इस काम में टूरिस्ट गाइड कन्नी गुरु (रवि किशन) लोगों की मदद करता है। वह विदेशी सैलानियों को लाता है और लोगों के घर में किराये पर ठहराता है, इसकी एवज में वह अपना कमीशन लेता है। लेकिन यह बात धर्मनाथ पांडेय को स्वीकार्य नहीं है। वह कहता है कि हम घाट को पिकनिक स्पॉट और गंगा को स्विमिंग पूल नहीं होने देंगे। वहीं, अस्सी में पप्पू की चाय की दुकान भी है, जहां बैठकर लोग धर्म, संस्कृति व राजनीति पर चर्चा करते रहते हैं और एक दूसरे को गरियाते रहते हैं। इसके बाद बनारस के अस्सी के घाट के इर्द-गिर्द बुनी गई यह कहानी कई उतार-चढ़ाव के साथ आगे बढ़ती है।

दूसरे हाफ में टूट जाती है लय
काशी नाथ सिंह का उपन्यास 'काशी का अस्सी' काफी दिलचस्प है। ऐसे में फिल्म की कहानी सियासत के गलियारों से गुजरती है तो यह भी दर्शाती है कि वैश्वीकरण किस तरह भारतीय समाज के मूल्यों का हनन करता है। बनारस की अलहदा संस्कृति के दर्शन के साथ मूवी की शुरुआत अच्छी होती है लेकिन दूसरे हाफ में कहानी बिखर सी गई है। चन्द्रप्रकाश द्विवेदी कहानी में एक साथ कई मुद्दों में उलझ गए हैं। 1988 से शुरू हुई कहानी 1998 तक पहुंचती है, पर बीच में ही तारतम्य बिगड़ गया है। सेंसर की कैंची चलने से बीच-बीच में कई बार संवादों की लय टूटती है। इस वजह से धर्म, संस्कृति, राजनीति और बनारस में रुचि रखने वालों को यह मूवी कुछ अटपटी सी महसूस होने लगती है। अभिनय में सनी देआल ने अपनी इमेज से अलग हटकर किरदार बढिय़ा ढंग से निभाया है, हालांकि संवाद अदायगी में उतने सहज नहीं दिखे। सनी की पत्नी के रोल में साक्षी तंवर ने सहज अभिनय किया है, वहीं रवि किशन अपनी परफॉर्मेंस से प्रभावित करते हैं। सौरभ शुक्ला, सीमा आजमी, मिथिलेश चतुर्वेदी, फैजल रशीद समेत अन्य सपोर्टिंग कास्ट का काम भी अच्छा है। गीत-संगीत बेअसर है। सिनेमैटोग्राफी अच्छी है।

क्यों देखें
फिल्म के प्रजेंटेशन और ट्रीटमेंट में काफी कसर रह गई। लिहाजा फिल्म के डायलॉग 'जो मजा बनारस में है, वह ना पेरिस में ना फारस में' की तर्ज पर कहें तो 'जो मजा 'काशी का अस्सी' में है, वो 'मोहल्ला अस्सी' में नहीं है। बहरहाल, अगर आप बनारस, संस्कृति, धर्म, आस्था और सियासी मसलों में दिलचस्पी रखते हैं तो एक बार 'मोहल्ला अस्सी' का रुख कर सकते हैं।