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Republic Day 2026: जानें जयपुर में कहां मना था पहला गणतंत्र दिवस, सवाई मानसिंह द्वितीय ने किया था झंडारोहण

जयपुर में पहला गणतंत्र दिवस ऐतिहासिक त्रिपोलिया गेट पर मनाया गया था। उस समय जयपुर रियासत के राजप्रमुख सवाई मानसिंह द्वितीय ने झंडारोहण किया था।

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प्रतीकात्मक तस्वीर: पत्रिका

जयपुर शहर गणतंत्र दिवस के अवसर पर देशभक्ति के रंग में रंगा नजर आने वाले है। शहरभर के स्कूलों में कई दिनों पहले से शुरू हो गई है। शहर के प्रमुख चौराहों, ऐतिहासिक इमारतों और सरकारी भवनों को रोशनी से सजाया जा रहा है।

आजाद भारत के पहले गणतंत्र दिवस के दिन जयपुर में पहली बार त्रिपोलिया गेट पर 26 जनवरी को मनाया गया था। उस ऐतिहासिक दिन शहर में खास उत्साह और उल्लास का माहौल था। आमजन से लेकर प्रशासन तक सभी ने इसे गर्व और सम्मान के साथ मनाया। बुजुर्गों और प्रबुद्ध नागरिकों के अनुसार, उस दौर में गणतंत्र दिवस केवल एक सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि आम जनता के लिए आज़ादी के असली अर्थ को महसूस करने का अवसर था। लोगों ने अपने घरों, बाजारों और सार्वजनिक स्थानों को सजाया और पूरे शहर में जश्न का माहौल बना रहा।

जयपुर फाउंडेशन के संस्थापक और अध्यक्ष सियाशरण लश्करी ने बताया कि जयपुर में पहला गणतंत्र दिवस ऐतिहासिक त्रिपोलिया गेट पर मनाया गया था। उस समय जयपुर रियासत के राजप्रमुख सवाई मानसिंह द्वितीय ने परेड की सलामी ली और झंडारोहण किया था।

ये आयोजन न केवल प्रशासनिक बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण था। उस दिन सरकार की ओर से कई बड़े फैसले लिए गए थे, जिनमें हजारों कैदियों को रिहा करना और किसानों के लगान और बकाया माफ करना भी शामिल था। सरकारी विभागों में अवकाश घोषित किया गया और शहरभर में रोशनी की गई। स्कूलों में विशेष कार्यक्रम आयोजित हुए, जहां बच्चों को मिठाइयां और फल वितरित किए गए। ये दिन जयपुर के इतिहास में एक नई शुरुआत और लोकतंत्र के स्वागत के प्रतीक के रूप में दर्ज हो गया।

उस दौर के सामाजिक और राजनीतिक माहौल को याद करते हुए शिक्षाविद व इतिहासकार प्रो. मधुकांता शर्मा बताती हैं कि गणतंत्र दिवस और उससे जुड़े आयोजन लोगों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने का माध्यम बनते थे। शाम के समय राजनीतिक सभाएं और सार्वजनिक कार्यक्रम हुआ करते थे, जिनमें बड़ी संख्या में लोग परिवार के साथ शामिल होते थे।

त्रिपोलिया गेट और रामलीला मैदान जैसे स्थानों पर होने वाली सभाओं में मेले जैसा माहौल रहता था। लोग जमीन पर दरी बिछाकर बैठते और देर रात तक भाषण सुनते थे। बच्चों और महिलाओं की भागीदारी भी इन आयोजनों में बराबर की होती थी।

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