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Flashback : 1975 की वो काली रात जिसके ज़िक्र से आज भी सिहर उठती है भारतीय राजनीति; फिर 21 मार्च के दिन हटे काले बादल

किसी युदृध के सायरन की तरह लगी रेडियो की आवाज: आजादी के महज 28 साल बाद ही देश को तत्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसले के कारण आपातकाल के दंश से गुजरना पड़ा। 25-26 जून की रात को आपातकाल के आदेश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया।

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जयपुर. भारतीय इतिहास में 21 मार्च की तारीख इमरजेंसी (Emergency in India) के खात्मे की आखिरी रात मानी जाती है। इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की तरफ से देश पर थोपी गई इमरजेंसी करीब 2 साल बाद आज ही के दिन 1977 में हटाई गई थी। 25 जून 1975 की आधी रात को इंदिरा गांधी सरकार ने इमरजेंसी का ऐलान किया था। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अनुरोध पर संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आपातकाल की घोषणा की थी। आज भी देश की राजनीति मेें इमरजेंसी को लेकर लोग सिहर जाते हैं और अलग तरह की बहस छिड़ जाती है। विपक्ष के नेता आज भी इस दौर को भारतीय राजनीति का काला पन्ना बताते हैं।

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किसी युदृध के सायरन की तरह लगी रेडियो की आवाज
आजादी के महज 28 साल बाद ही देश को तत्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के फैसले के कारण आपातकाल के दंश से गुजरना पड़ा। 25-26 जून की रात को आपातकाल के आदेश पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया। अगली सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में संदेश सुना कि भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर पूरे देश में न फैल सके इसके लिए दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई।

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जयप्रकाश नारायण समेत कई नेताओं को ठूंंसा गया था जेल में
इमरजेंसी (Emergency in India) के दौरान मीसा और डीआईआर के तहत देश में एक लाख से ज्यादा लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। आपातकाल के खिलाफ आंदोलन के नायक जय प्रकाश नारायण की किडनी कैद के दौरान खराब हो गई थी । उस काले दौर में जेल-यातनाओं की दहला देने वाली कहानियां भरी पड़ी हैं। देश के जितने भी बड़े नेता थे, सभी को सलाखों के पीछे डाल दिया गया था, बताया जा रहा है कि इस दौरान देश में राजनीतिक दौड़ लगभाग खत्मे पर थी। सभी छोटे बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था।

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असीमित अधिकारों से चली सरकार
आपातकाल के दौरान सत्ताधारी कांग्रेस आम आदमी की आवाज को कुचलने की निरंकुश कोशिश की। इसका आधार वो प्रावधान था जो धारा-352 के तहत सरकार को असीमित अधिकार देती थी।
-इंदिरा जब तक चाहें सत्ता में रह सकती थीं।
-लोकसभा-विधानसभा के लिए चुनाव की जरूरत नहीं थी।
-मीडिया और अखबार आजाद नहीं थे
-सरकार कैसा भी कानून पास करा सकती थी।

आखिर जेल में शुरू होने लगी राजनीति पाठशालाएं
एक तरह से जेलें राजनीतिक पाठशाला बन गईं। बड़े नेताओं के साथ जेल में युवा नेताओं को बहुत कुछ सीखने-समझने का मौका मिला। एक तरफ नेताओं की नई पौध जेलों में राजनीति सीख रही थी तो दूसरी तरफ इंदिरा के बेटे संजय गांधी और उनके सलाहकार देश चलाने में महारथ हासिल कर रहे थे। इसी दौरान संजय गांधी (Indira Gandhi) ने वीसी शुक्ला को नया सूचना प्रसारण मंत्री बनवाया जिन्होंने मीडिया पर सरकार की इजाजत के बिना कुछ भी लिखने-बोलने पर पाबंदी लगा दी, जिसने भी इनकार किया उसे जेलों में डाल दिया गया।

विवादास्पद माना जाता है इंदिरा गांधी का ये कार्यकाल

25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 (Emergency in India) तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी (Indira Gandhi) के कहने पर भारतीय संविधान की अनुच्छेद 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। इसकी जड़ में 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंदी राजनारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव न लड़ने का प्रतिबंध लगा दिया। और राजनारायण सिंह को चुनाव में विजयी घोषित कर दिया था।