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विरासत के झरोखे से : भृर्तहरि गुम्बद की स्वर्णिम आभा पर बदहाली का ग्रहण

मैं भृर्तहरि गुम्बद हूं। इतिहास में मेरा नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। जब भी राजस्थान की धरा पर सबसे बड़े गुम्बदों की चर्चा होती है तो सबसे पहले मेरा नाम आता है।

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aniket soni

Jan 29, 2016

मैं भृर्तहरि गुम्बद हूं। इतिहास में मेरा नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। जब भी राजस्थान की धरा पर सबसे बड़े गुम्बदों की चर्चा होती है तो सबसे पहले मेरा नाम आता है। इससे मेरा सीना गर्व से फूल जाता है, लेकिन जब मेरी हालत देखता हूं तो फिर से निराशा छा जाती है।

निराशा छाए भी क्यों नहीं, मैंने राजस्थान को इस गुम्बद के रूप में वास्तुकला का बेजोड़ नमूना उपहार स्वरूप दिया, लेकिन प्रदेशवासियों ने मेरी सार-संभाल करना भी मुनासिब नहीं समझा। मैं आपको बताना चाहूंगा कि कुछ साल पहले जब पुरातत्व विभाग के जिम्मेदार हाकिमों ने मेरा जिम्मा उठाया तो लगा अब तो कुछ उद्धार होगा, लेकिन ये मेरी भूल ही थी।

विभाग ने मात्र कुछ राशि खर्च कर अपने कर्तव्य की इतिश्री पूरी कर ली, मेरे सौन्दर्यकरण की ओर ध्यान नहीं दिया। इतना ही नहीं, मेरी सुरक्षा के लिए सुरक्षाकर्मी को स्थायी रूप से यहां तैनात करने की जहमत भी नहीं उठाई। यहीं कारण है कि यहां गंदगी व कचरे का आलम है, जो मेरी स्वर्णिम आभा पर ग्रहण की भांति लगे हुए हैं। इस ग्रहण को हटाने की जरूरत है।
Bhatruhari dome collapse on the golden halo

स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है गुम्बद

ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार 1500 ई.र्पू. के करीब अलाउद्दीन लोदी ने तिजारा कस्बे में शंकर गढ़ आश्रम के पास विशाल भृर्तहरि गुम्बद का निर्माण करवाया था। इस गुम्बद की गिनती उत्तरी भारत के बड़े गुम्बदों के रूप में की जाती है, वहीं राजस्थान में तो इसे सबसे बड़े गुम्बद के रूप में मान मिला हुआ है।

यह गुम्बद स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। करीब 240 फीट ऊंचे इस गुम्बद में आठ बड़े स्तम्भ है, जो कि कलात्मकता लिए हुए हैं। इतना ही नहीं, इन ऊंचे स्तम्भों पर 16 छोटे कमरे निर्मित करवाए गए हैं, जो कि देखने वालों को भी एकबारगी चकित करते हैं।

काफी बड़े क्षेत्रफल में फैले इस गुम्बद की ऊपरी मंजिल पर 23 घुमटियां बनी हुई हैं। हालांकि, देखरेख के अभाव के कारण इनमें से कुछ घुमटियां खंडित हो चुकी हैं। वैसे, गुम्बद की ऊपरी मंजिल पर जाने के लिए सीढिय़ां भी हैं।
Bhatruhari dome collapse on the golden halo

पुरातत्व विभाग के अधीन, फिर भी नहीं सारसंभाल

कस्बे में शंकर गढ़ आश्रम के पास स्थित इस ऐतिहासिक गुम्बद को पुरातत्व विभाग ने अपने अधीन ले रखा है, लेकिन पर्याप्त देखरेख के अभाव में इसके चारों ओर बदहाली का आलम है।

समाज कंटकों ने यहां तोडफ़ोड़ कर रखी है तो स्थायी रूप से इस ऐतिहासिक विरासत की सुरक्षा के लिए कोई चौकीदार नहीं है। हालांकि, कुछ समय पूर्व विभाग ने राशि खर्च कर विकास कार्य करवाए थे, लेकिन इस गुम्बद के सौन्दर्यकरण पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया।
Bhatruhari dome collapse on the golden halo

उज्जैन के राजा भृर्तहरि ने दिया था त्याग का परिचय

जनश्रुतियों को मानें तो जब यहां गुम्बद का निर्माण हो रहा था, उस दौरान उज्जैन के महाराजा भृर्तहरि भी तिजारा में आए हुए थे। कहा जाता है कि भृर्तहरि ने भी इसके निर्माण के दौरान मजदूरी की थी, लेकिन जब भी श्रमिकों को बतौर पारिश्रमिक दिया जाता था।

जब महाराजा भृर्तहरि यहां से नदारद रहते थे, लेकिन अगले दिन मजदूरी पर पहुंच जाते थे। धीरे-धीरे इनके त्याग की खूब चर्चा होने लगी तो यह गुम्बद भर्तृहरि के नाम से विख्यात हो गया।

ओमप्रकाश गुप्ता शिक्षाविद ने बताया कि सरकारी कारिंदों को चाहिए कि वे इस ऐतिहासिक गुम्बद की देखरेख करे। इसे स्थल को पर्यटन स्थल के रूप में उभारना चाहिए, ताकि सैलानी आकर्षित हो सके और लोगों को रोजगार मिल सके।

राकेश यादव भाजपा नेता तिजारा ने बताया कि गुम्बद की बदहाली से राज्य सरकार को अवगत करवाया जाएग, ताकि इसे पर्यटन स्थल के रूप में उभारा जा सके। इसके लिए पुरातत्व विभाग के अधिकारियों से भी बात की जाएगी।

कमलेश सैनी पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष तिजारा ने बताया कि गुम्बद परिसर में गंदगी का आलम है। परिसर की करीब दो बीघा जमीन की साफ-सफाई करवानी चाहिए। विभाग इसे पार्क के रूप में विकसित करवा सकता है, ताकि विरासत को मान मिल सके।

उर्मिला सैनी अध्यक्ष नगर पालिका तिजारा ने बताया कि भृर्तहरि गुम्बद को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए राज्य सरकार को पत्र भिजवाया जाएगा। गुम्बद के चारों ओर खाली जमीन की सफाई कर इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करवाया जाएगा।