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गर्व अभियान के 10 साल: सरहद के वीरों और उनके परिवारों का एक दशक का हमसफर, 1 लाख से अधिक जांबाजों का सम्मान

'गर्व-एक शाम उनके नाम, जिन पर हमें गर्व है' अभियान ने 10 साल पूरे कर लिए हैं। 2016 में शुरू हुई इस मुहिम के तहत अब तक सेना, BSF, CRPF, पुलिस, पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों सहित 1 लाख से अधिक वीरों का सम्मान किया जा चुका है। अभियान वर्दीधारियों के साथ उनके परिवारों के योगदान को भी सम्मान देता है।
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जयपुर

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Arvind Rao

Jul 04, 2026

Garv Campaign Turns 10 year

जयपुर में हुए समारोह में पुलिस के जवानों, सैनिकों को सम्मानित किया गया (पत्रिका फोटो)

जयपुर: साल 2016 की उस शाम देश-दुनिया में दिवाली की रौनक थी और घरों में दीयों के साथ समृद्धि के दीप भी जगमगा रहे थे। जेहन में एक ही ख्याल आ रहा था कि हम अपनों के बीच मिठाई बांट रहे हैं, तब कोई जवान सियाचिन की बर्फीली चोटियों या जैसलमेर के तपते रेगिस्तान में हमारी सुरक्षा के लिए अकेला खड़ा है। उसके बच्चे उसकी राह देख रहे होंगे। तभी भीतर से आवाज आई, क्या हमारा फर्ज नहीं बनता कि हम उनके पास जाएं और उन्हें कहें कि हमें आप पर गर्व है?

इसी के साथ जन्म हुआ 'गर्व-एक शाम उनके नाम, जिन पर हमें गर्व है' अभियान का। इस गौरवशाली मुहिम ने हाल ही 10 वर्ष पूरे किए है। 'गर्व' अभियान के संस्थापक हिमांशु चौहान ने बताया कि कैसे उन्होंने इस सोच को राष्ट्रव्यापी जनआंदोलन में बदल दिया है।

जोधपुर से शुरू हुई यह मुहिम जैसलमेर की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से होते हुए जयपुर स्थित सेना के साउथ वेस्टर्न कमांड तक पहुंच चुका है। यहां हाल ही सेना, बीएसएफ, सीआरपीएफ, राजस्थान पुलिस, पूर्व सैनिकों व परिवारों का सम्मान किया गया।

सम्मान से राष्ट्र निर्माण तक की यात्रा

हिमांशु ने बताया कि शुरुआत में छोटी सी इच्छा थी कि देश की रक्षा करने वाले वीरों का सम्मान किया जाए। बाद में समाज और वर्दीधारियों के प्यार ने इस प्रयास को लाखों लोगों को जोड़ने वाला राष्ट्रीय अभियान बना दिया।

देश के 'अदृश्य नायकों' को सलाम

अभियान की अहम विशेषता यह है कि इसने बंदूक थामे जवान के साथ ही उसके परिवार का भी हाथ थामा है। उन्होंने बताया कि उन माता-पिता, पत्नियों और बच्चों को मंच पर सम्मानित किया जाता है जो जवान के मोर्चे पर होने पर पूरा घर संभालते हैं। दस वर्षों में अभियान ने प्रत्यक्ष रूप से एक लाख से अधिक सैनिकों, सीएपीएफ जवानों, पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों को सीधे खुद से जोड़कर उनके त्याग को समाज के सामने रखा है।