
जयपुर के अराध्य गोविन्ददेवजी का प्राकट्य वर्ष 1536 में माना जाता है। विधिवत अभिषेक के बाद वृन्दावन के गोमा टीला नामक स्थान पर एक चबूतरा बनाकर रूप गोस्वामी एक पर्णकुटी में ही सेवा पूजा करने लगे।
जब सवाई मानसिंह ने कुटी में भगवान के दर्शन किए तो उन्होंने वृन्दावन में एक भव्य मंदिर बनाने का संकल्प लिया। मंदिर के प्रवक्ता मानस गोस्वामी के अनुसार कहा जाता है कि भगवान कृष्ण के पड़पोते वज्रनाभ ने अपनी माता से गोविंद के स्वरूप के बारे में सुना था तो उसी के आधार पर उन्होंने उनका विग्रह तैयार करवाया। गोमा टीले से प्राकट्य होने के 17 वर्ष बाद राधारानी को उड़ीसा से लाकर गोविंद के वामांग में विराजित किया गया।
औरंगजेब की विध्वंसकारी नीति के डर से शिवराम गोस्वामी गोविंददेवजी व राधारानी की प्रतिमा को वृंदावन से गोनेर रोड स्थित रोपाड़ा गांव में स्थापित किया। कुछ सालों के बाद वहां से विग्रहों को कनक वृंदावन लाया गया और राधारानी को गोविंददेवजी के साथ विराजित किया गया।
सवाई जयसिंह ने विग्रहों को 1735 में सूरज महल प्रतिष्ठित किया। 1739 में वर्तमान मंदिर में गोविंददेवजी का पहला पाटोत्सव हुआ। सूर्य महल में गोविन्ददेवजी को विराजित करने के बाद सवाई जयसिंह ने 1783 में राधाजी की सेवा के लिए विशाखा सखी की प्रतिमा चढ़ाई। इसके बाद महाराजा प्रतापसिंह ने राधाजी की सेवा के लिए ललिता सखी की प्रतिमा चढ़ाई। ये दोनों सखियां आज भी गोविन्ददेवजी की झांकी की शोभा बढ़ा रही है।