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सरकारी मान्यता जरुरी हो तो एेसे स्कूल नहीं दे सकते धर्म विशेष की शिक्षा

(Kerla Highcourt)केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि जिन (Schools) स्कूलों के लिए (RTE Act) आरटीई एक्‍ट के तहत (Recognisation) मान्यता प्राप्त करना जरूरी है, वह (Religious Teaching) धार्मिक निर्देश या अन्य धर्मों पर तरजीह देते हुए किसी (Specific religion) विशेष धर्म की शिक्षा प्रदान नहीं कर सकते।

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सरकारी मान्यता जरुरी हो तो एेसे स्कूल नहीं दे सकते धर्म विशेष की शिक्षा

सरकारी मान्यता जरुरी हो तो एेसे स्कूल नहीं दे सकते धर्म विशेष की शिक्षा

जयपुर

(Kerla Highcourt)केरल हाईकोर्ट ने कहा है कि जिन (Schools) स्कूलों के लिए (RTE Act) आरटीई एक्‍ट के तहत (Recognisation) मान्यता प्राप्त करना जरूरी है, वह (Religious Teaching) धार्मिक निर्देश या अन्य धर्मों पर तरजीह देते हुए किसी (Specific religion) विशेष धर्म की शिक्षा प्रदान नहीं कर सकते। जस्टिस मुहम्मद मुश्ताक एक प्रश्न की पड़ताल कर रहे थे कि क्या सरकारी मान्यता जरुरी होने वाले निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को प्राथमिक शिक्षा के साथ किसी विशेष धर्म को अन्य धर्मों पर तरजीह देते हुए बढ़ावा देने का अधिकार है या नहीं ?

यह था मामला-
हिदाया एजुकेशनल एंड चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से संचालित एक गैर-सहायता प्राप्त और प्राथमिक निजी स्कूल ने याचिका दायर की थी। याचिका में राज्‍य सरकार द्वारा स्कूल को बंद करने की कार्रवाई को चुनौती दी गई थी। राज्य सरकार का आरोप था कि स्कूल में एक विशेष धर्म के धार्मिक निर्देश दिए जाते हैं और एक विशेष धर्म के स्टूडेंट्स को ही स्वीकार किया जाता है। इससे समाज के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को खतरा पैदा हो गया है। स्कूल पर आरोप था कि उसे सरकारी मान्यता या सीबीएसई की संबद्धता के बिना चलाया जा रहा है। स्कूल में 200 से अधिक छात्रों को भर्ती किया है। खुफिया रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए राज्य सरकार ने स्कूल को बंद करने का आदेश दिया था। सरकार का कहना था कि स्कूल में केवल एक विशेष समुदाय के बच्‍चों को ही प्रवेश दिया जा रहा है।

धार्मिक निर्देश और शिक्षा में है अंतर-

कोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 28 (1) के तहत सरकारी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक निर्देश देने पर पूर्ण प्रतिबंध है। हालांकि हमारा संविधान मान्यता प्राप्त या सरकारी आर्थिक सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों को अभिभावकों की सहमति से धार्मिक निर्देश देने की इजाजत देता है।
धार्मिक‌ निर्देश और धार्मिक शिक्षा के बीच अंतर को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने कहा कि संविधान में शैक्षणिक संस्‍थानों में धार्मिक शिक्षा प्रदान करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है,लेकिन शै‌क्षण‌िक संस्‍थानों में किसी विशेष धर्म के निर्देश देने पर प्रतिबंध है। सुप्रीम कोर्ट भी अरुणा रॉय व अन्य के मामले में धार्मिक अन्यन्ता पर आधारित धार्मिक शिक्षा के खिलाफ आगाह कर चुका है।

भारतीय लोकतंत्र को चलाने वाला है-
कोर्ट ने कहा है कि धर्मनिरपेक्षता उस पहिये का हिस्सा है जिसे भारत में राजनीतिक लोकतंत्र को संचालित करना है। यह उन स्तंभों में से एक है जिस पर संविधान के तहत भारत की इमारत का निर्माण किया गया। धर्मनिरपेक्षिता एक मूल्य रूप में कई कई अन्य मूल्यों के साथ परस्पर जुड़ी हुई है और जिनसे उदार लोकतंत्र में संविधान की नैतिकता का निर्माण होता है। राज्य या सार्वजनिक अधिकारियों या निजी निकायों द्वारा सार्वजनिक कार्यों के निर्वहन में दूसरे धर्मों पर एक धर्म को विशिष्टता या वरीयता देना हमारे संविधान के मौलिक मूल्यों में से एक धर्मनिरपेक्षता की जड़ों पर हमला करता है। यह तटस्थता की उपेक्षा करता है, भेदभाव को बढ़ावा देता है और समान उपचार से इनकार करता है।

धर्मनिरपेक्ष चरित्र का विरोध है यह-
सरकारी मान्यता की जरुरत वाले निजी स्कूलों को दूसरे धर्मों पर एक धर्म को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। निजी शैक्षणिक संस्थानों द्वारा किसी विशेष धर्म का विशेष प्रचार संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र का विरोध करता है और संविधानिक मूल्य और नैतिकता से इनकार करता है। एक व्यक्ति या एक समूह या एक संप्रदाय को अपने धर्म को व्यक्त करने और उसे बढ़ावा देने और उसका अभ्यास करने की स्वतंत्रता है,लेकिन निजी संस्था को यह स्वतंत्रता नहीं है। भारत जैसे बहुलतावादी समाज में, जो धर्मनिरपेक्षता को शिक्षा सहित धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को संचालित करने में मूल मानदंड के रूप में स्वीकार करता है, उसे धार्मिक बहुलतावाद पर आधारित धार्मिक शिक्षा या निर्देश प्रदान करने में कोई कठिनाई नहीं हो सकती है।

अदालत ने कहा कि धार्मिक शिक्षा और निर्देश मूल्य आधारित शिक्षा को ढालने में सक्षम है। हालांकि इन्‍हें बहुसांस्कृतिक पद्धति के माध्यम से तय किया जाएगा, ताकि माता-पिता को अपने बच्चों के लिए उपयुक्त पद्घति चुन सकें। अदालत ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रदान करने वाले कोई भी प्राथमिक विद्यालय एक धर्म को दूरसे धर्मों पर बढ़ावा नहीं दे सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस निजी स्कूल को सरकारी मान्यता की आवश्यकता होती है वह सरकार मान्यता प्राप्त करने के बाद धार्मिक बहुलवाद पर आधारित धार्मिक या अध्ययन शिक्षा प्रदान करने का हकदार है। कोर्ट ने मामले का निपटारा करते हुए शिक्षा विभाग को निर्देश दिया जाता है कि वह राज्य के सभी मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों को एक सामान्य सरकारी आदेश जारी करें ताकि सरकार की अनुमति के बिना धार्मिक शिक्षा या धार्मिक अध्ययन को लागू न किया जा सके। यदि सरकार पाती है कि निर्देंशों के बावजूद, स्कूल आदेश का उल्लंघन कर रहे हैं तो सरकार ऐसे स्कूलों को बंद करने और मान्यता खत्म करने की कार्रवाई कर सकती है।


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