
गुलाबी नगर में गुलजार आते हैं तो शायरी गुलजार हो उठती है और लोग बाग-बाग। फ्रंट लॉन में हुए बाल-ओ-पार सेशन में गुलजार ने सेशन के आखिर में अपनी पुरकशिश आवाज में जब नज्म सुनाना शुरू किया तो दर्शकों को लगा कि जैसे उनके दिल में सीधे आज अल्फाजों ने दस्तक दी है।
गुलजार वक्त पूछते रहे और लोग वाह-वाह करते रहे। वो बात कर रहे थे अपनी नज्म रूह देखी है कभी, रूह को महसूस किया है और दर्शकों को लगा जैसे कि उन्होंने उसे महसूस कर लिया। इस नज्म के आखिर में जब उन्होंने सुनाया कि
जिस्म सौ बार जले तब भी मिट्टी का ढेला,
रूह एक बार जले तो कुंदन ही होगी
और फिर वह एक बाद सुनाते
चले गए...
मैं गमला ढूंढ रहा हूं
मुझे एक लफ्ज बोना है
मैं अक्सर जिक्र सुनता हूं मगर मानी
नहीं आते
उगे तो शायद उसका कोई रंग
निकले या कोई पहचान खुशबू की
कोई पत्ती या कोंपल निकले तो
आकार से शायद समझ आए...
वहीं.... सूरज ने 45 डिग्री ऊपर उठकर देखा मुझको...नज्म सुना कर वाह-वाही बटोरी तो इसी तरह से उन्होंने मुंबई के बांद्रा वरली सी लिंक के समुद्र को साढ़े तीन मिनट में पार करने पर लिखी नज्म में उन्होंने अपने अंदाज में समझाया कि साढ़े तीन मिनट में क्या-क्या हो सकता है....
कभी सी लिंक से गुजरे तो होगे तुम
वो साढ़े तीन मिनट और समुंदर पार कर आए
समुंदर मुख्तसर हो जाते हैं अक्सर
सुना तो होगा साढ़े तीन मिनट में सहगल का गाना
बाबुल मोरा नेहर छूटा जाए
पूरी दास्तान नेहर छूटने की साढ़े तीन मिनट में सुना दी..
उन्होंने कहा कि जब मैं आज की लड़कियों को देखता हूं तो कहना पड़ता है....
उदास-उदास लड़की
तुझको देखकर जर्द हो गई है शाम
मुंह उतर गया है आसमान का
मुस्करा कि चांद झांक कर फक से देख रहा है...
वक्त हमेशा एक सा चलता है
फिर भी घड़ियों के टाइम क्यों नहीं मिलते
हर शख्स कलाई देखकर अपने साथ वाले से पूछता है
क्या टाइम हुआ
कोई चंद मिनट पीछे, कोई चंद बरस आगे
वक्त अलग-अलग लोगों के साथ अलग-अलग चलता है।
सेशन में आखिर में अपनी लंबी नज्म सुनाते हुए उन्होंने कहा कि जैसे ग्राहक फंसाने के लिए थोड़ा-थोड़ा चखा देते हैं, वैसे ही आपके मांगने तक लिखता रहूंगा...
बड़े लंबे सफर से लौट कर आया समंदर रात साहिल पर
कई मुल्कों के साहिल छू कर आया था थका-मांदा....
अपनी मोटी सी किताब का जिक्र करते हुए गुलजार ने कहा कि अब नई दो उनकी किताबें इतनी भारी हैं कि इन्हें उठा कर आप डंबल की तरह वर्जिश के काम में ले सकते हैं।
वीडियो कॉल करना सीखा
इस किताब के अनुवाद का काम कोरोना काल में हुआ था। रक्षंदा जलील का कहना था कि इसी किताब के लिए गुलजार साहब ने वीडियो कॉल करना सीखा। वह हर रोज दो घंटे कॉल करते और अनुवाद के साथ-साथ कोमा, बिंदी, फुलस्टॉप तक का जिक्र करते।
कैसे करें बुढ़-बुढ़ का अनुवाद
जब बारी गुलजार की नज्मों के अनुवाद की हो और वह भी अंग्रेजी में तो अच्छे-अच्छे अनुवादकों को समझ नहीं आता कि क्या करें। कुछ ऐसा ही हाल था पूर्व राजनयिक और अनुवादक पवन के वर्मा का, जब उन्हें गुलजार की नज्म बुढ़ बुढ़ कर बहता है यह बुड्ढा दरिया....का अनुवाद करना पड़ा। उन्हें समझ नहीं आया कि बुढ़-बुढ़ का अनुवाद क्या करें। जहां पवन वर्मा का कहना था कि अनुवाद इत्र को एक बोतल से निकाल कर दूसरी बोतल में डालना है, जिसमें थोड़ा इत्र बिखर जाता है, वहीं गुलजार का कहना था कि इसमें इत्र भले ही थोड़ा बिखर जाए लेकिन खुशबू नहीं जाती।
Published on:
02 Feb 2024 12:18 pm
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