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Hindu nav samvatsar 2075 : भारतीय नवसंवत्सर के ये वैज्ञानिक रहस्य जानकर आपको भी होगा इस पर गर्व

भारतीय नवसंवत्सर के वैज्ञानिक रहस्य ।

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जयपुर

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rohit sharma

Apr 02, 2018

Hindu nav samvatsar 2075

Hindu nav samvatsar 2075

जयपुर।

हमारी धड़कनें और जीवन दोनों ही नव संवत्सर के हिसाब से हैं। यह विशुद्ध रूप से हमारी परंपराओं से जुड़ा कलैण्डर है जिसमें वैज्ञानिकता है। सही मायने में यह सृष्टि का आरंभ माना जाता है। हिंदी साहित्य का इतिहास नामक पुस्तक में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहीं भी ईस्वी सन् का उल्लेख नहीं किया है। उन्हें जहां भी तिथि और वर्ष के संदर्भ की आवश्यकता पड़ी वहां भारतीय संवत्सर का ही उल्लेख किया है। ईस्वी संवत् ईसा के जन्म वर्ष के हिसाब से प्रचलित है, जिसे अब धीरे-धीरे हमारे यहां भी अपना लिया गया है। लेकिन आज भी हमारे सब तीज-त्योहार हमारे भारतीय पंचाग के हिसाब से ही मनाए जाते हैं।


नई पीढी नहीं है तिथियों और हिंदी माह के नाम

वर्ष प्रतिपदा से नववर्ष शुरू होता है और साल भर के सभी त्योहार की तिथियों का निश्चय इसी के अनुरूप होता है। दरअसल इस्लाम ने चंद्रमा आधारित कलैण्डर अपनाया और अंग्रेजों ने सूर्य आधारित। जबकि हमारे कलैण्डर की वैज्ञानिकता में दोनों का ही समावेश है। यह चिंता की बात है कि हम भारतीय पद्धति के पंचाग पर आधारित तिथि व माह को भूलते जा रहे हैं। हमें इनकी जानकारी जरूरी है। आज शायद नई पीढी को चैत्र, वैशाख आदि महीनों का नाम और क्रम शायद याद भी न हो। लेकिन वैज्ञानिकता इन्हीं की है।

विक्रमादित्य ने पूरे भारत का शासन संभाला उसी दिन से शुरू है वर्षों की गणना

जब विशाखा नक्षत्र होता है तो वैशाख, चित्रा नक्षत्र होता है तो चैत्र और इसी क्रम में हर माह के नाम और तिथियों के नाम हैं। ऐतिहासिक तथ्यों में जाएं तो उज्जैन के नरेश विक्रमादित्य ने पूरे भारत का शासन संभाला, उस दिन से वर्ष की गणना शुरू हुई। तब से ही इसे विक्रम संवत् कहा जाने लगा।

कलयुग को हुए 5118 वर्ष

यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि काल गणना का वर्ष का अलग होता है और पंचाग अलग। चैत्र से लेकर फाल्गुन तक का पंचाग और भी पहले से इसलिए चला आ रहा है क्योंकि माना जाता है कि चैत्र शुल्क प्रतिपदा को ब्रह्मा ने सृष्टि का प्रारंभ किया। इसी कारण विक्रम संवत की शुरुआत भी चैत्र के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होती है। अन्य संवत्सर भी इसी दिन से प्रारंभ होते है जैसे कलयुग को शुरू हुए 5118 वर्ष पूरे हो गए और यह 5119वां वर्ष लग रहा है। महाराष्ट्र में भी नए साल को गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है।


पंचाग होता है चैत्र से ही प्रारंभ

दक्षिण भारत में इसे युगादि के नाम से पुकारा जाता रहा है जो अब अपभ्रंश होकर उगादि हो गया। इस प्रकार वर्ष गणना अलग-अलग भले ही हों लेकिन पंचाग चैत्र से ही प्रारंभ होता है। छह ऋतुओं में से नववर्ष बसंत से शुरू होता था। अब चाहे 10-15 वर्ष का अंतर आ गया हो। देश में विभिन्न संवत्सर चल रहे हैं। शालिवाहन वर्ष भी चलता रहा है जिसे 1938 वर्ष पूरे हो गए हैं और 1939वां वर्ष शुरू हो गया है। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने 1957 में एक आदेश द्वारा इसी शक संवत्सर को अधिकृत मानते हुए इसका सारे पत्राचार में प्रयोग शुरू किया था।


भारत में आज भी वित्त वर्ष अप्रेल,शैक्षणिक वर्ष जुलाई से होता है शुरू

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मेघनाद साहा सहित वैज्ञानिकों की एक समिति बनाई थी जिसमें तीन चार प्रकार के वर्षारंभ के समन्वय से यह कलैण्डर बनाया था। हमारे यहां वित्त वर्ष अप्रेल से मार्च तक चलता है। शैक्षणिक वर्ष जुलाई से मई तक चलता है। अंग्रेजी वर्ष जनवरी से दिसंबर तक और भारतीय वर्ष चैत्र से फाल्गुन तक चलते हैं। इन सबको समन्वित करते हुए एक अधिकृत भारतीय शकाब्द पूरे देश में चले यह समिति की सिफारिश थी। इसी आशय की आज्ञा केंद्र सरकार ने मार्च 1957 में निकाली थी। इस शकाब्द में कृष्ण और शुक्ल पखवाड़े नहीं होते और इसमें 30 और 31 तिथियां ही होती हैं।

इस आदेश की पालना कुछ वर्षों तक तो होती रही। आजकल केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन से ही इस शकाब्द की शुरुआत की घोषणा होती है। अन्यथा यह पूरी बातें विलुप्त हो चुकी है। आज विक्रम वर्ष प्रारंभ हो रहा है व अनेक सदियों से इतिहास का आधार रहा है।


महापुरुषों की जयंतियां है पुराने पंचांग के अनुसार

भारत का इतिहास ही नहीं हिंदी साहित्य और संस्कृत साहित्य तथा भारतीय संस्कृति का इतिहास भी विक्रम संवत् की तिथियां ही उल्लेखित करते रहे हैं। अंग्रेजों के आने से पहले जिन महापुरुषों की जयंतियां आती थीं, वे सब आज भी इसी पंचांग के अनुसार मनाई जाती हैं।

नानक जयंती कार्तिक पूर्णिमा, प्रताप जयंती ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को महावीर जयंती चैत्र शुक्ल और गुरु गोविंद सिंह जयंती पौष शुक्ल सप्तमी को मनाई जाती है। अंग्रेजी कलैण्डर से ये मनाई ही नहीं जा सकतीं। यही कारण है कि अंग्रेजियत जितनी भी हावी हो जाए लेकिन भारत में भारतीय कलैण्डर ही प्रासंगिक रहेगा।

ईसाई और इस्लामी कलैण्डर के दिनों में है अंतर

जनवरी-दिसंबर वाला ईसाई कलैण्डर 365 दिन वाला होता है और यह सूर्य पर आधारित है। इस्लामी कलैंडर 354 दिन का है और चंद्र आधारित है। चैत्र से फाल्गुन वाला भारतीय पंचांग सूर्य, चंद्र और नक्षत्रों का समन्वय करके चलता है। अमावस्या को चांद नहीं दिखेगा, हर पूर्णिमा को पूरा दिखाई देगा, हर पूर्णिमा विशिष़्ट नक्षत्र होगा जिसके नाम से वह मास जाना जाता है। इस प्रकार सूर्य, चंद्र और नक्षत्रों के समन्वय से हर तीसरे वर्ष अधिक मास भी जोड़़ा जाता है। दूसरे शब्दों में यह पंचांग समूचे ब्रह्मांड का समन्वय से चलता है।