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Holi 2024: होली के दिन कहीं फूल तो कहीं जमकर बरसते हैं पत्थर, जानें राजस्थान की अनूठी परंपरा

राजस्थान में कहीं लोग अपनी पुरानी परंपराओं से होली खेलते हैं तो कहीं रंग लगाने के अनोखे तरीके भी हैं। राज्य के कई जिलों में रंगों से तो कहीं फूलों के साथ होली खेली जाती है।

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जयपुर

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Savita Vyas

Mar 24, 2024

holi 2024: होली के दिन कहीं फूल तो कहीं जमकर बरसते हैं पत्थर, जानें राजस्थान की अनूठी परंपरा

holi 2024: होली के दिन कहीं फूल तो कहीं जमकर बरसते हैं पत्थर, जानें राजस्थान की अनूठी परंपरा

जयपुर। फाल्गुन महीने की शुरूआत के साथ ही हवाओं में होली के रंग और अबीर गुलाल उड़ने लगा है। बाजार रंगों से सजे हैं। होली का खुमार लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है। राजस्थान में कहीं लोग अपनी पुरानी परंपराओं से होली खेलते हैं तो कहीं रंग लगाने के अनोखे तरीके भी हैं। राज्य के कई जिलों में रंगों से तो कहीं फूलों के साथ होली खेली जाती है।

फूलों वाली होली

राजधानी जयपुर के गोविंददेव मंदिर में होली का त्योहार काफी धूमधाम और जोश से मनाते हैं। मंदिर में लोग गुलाब और अन्य फूलों से होली खेलते हैं। इस दौरान राधा-कृष्ण के प्रेमलीला का मनोहर मंचन भी किया जाता है। इस बार होली पर गोविंद देव मंदिर में 200 किलो फूलों से होली पर्व मनाया गया।
लोग खेलते लट्ठमार होली
मथुरा और वृंदावन की लट्ठमार होली दुनियाभर में प्रसिद्ध है। मथुरा के लगता जिला होने के चलते भरतपुर और करौली के नंदगाव में लोग आज भी लठ्ठमार होली खेलते हैं। इस दौरान वहां का नजारा कुछ और ही होता है। वहीं, राजस्थान के शेखावाटी इलाके में होली पर चंग और महरी नृत्य करने की परंपरा है। पुरुष चंग को एक हाथ से थामकर और दूसरे हाथ से थपकियां बजाकर सामूहिक नाच करते हैं। इसमें शामिल होने वाले कलाकार महिला का वेश भी धारण कर नाचते हैं, जिन्हें ‘महरी’ कहते हैं।

कोड़ामार होली
वहीं श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ में कोड़ामार होली खेलने की परंपरा सालों से चल रही है। यहां लोग ढोल की थाप पर टोली में रंग-गुलाल उड़ाते हुए होली खेलते हैं। इसके बाद महिलाओं की टोली कपड़े को कोड़े की तरह लपेट कर रंग में भिगोकर पुरुषों को मारती है।

अंगारों पर चलकर मनाते हैं होली

राज्य के डूंगरपुर जिले की होली सबसे अनोखी मानी जाती है। यहां वांगड़वासी होली के एक महीने पहले ही तैयारियों में जुट जाते हैं। होली के दिन जिले के कोकापुर गांव में लोग होलिका के दहकते अंगारों पर नंगे पांव चलने की परंपरा आज भी निभाते हैं। लोगों का मानना है कि होलिका दहन के अंगारों पर चलने से घर में कोई भी विपदा नहीं आती है।

पत्थरमार होली की परंपरा

डूंगरपुर में ही भीलूड़ा में खूनी होली काफी चर्चा में रहती है। यहां पिछले 200 साल से धुलंडी पर लोग खतरनाक पत्थरमार होली खेल रहे हैं। डूंगरपुर के लोग रंगों के स्थान पर पत्थर बरसा कर खून बहाने को होली के दिन शगुन मानते हैं। इस दिन भारी संख्या में लोग स्थानीय रघुनाथ मंदिर परिसर में आते हैं और दो टोलियों बनाकर एक दूसरे पर पत्थर बरसाना शुरू कर देते हैं। इस खेल में घायल लोगों को तुरंत अस्पताल भी भर्ती करवाया जाता है।