
जयपुर। परम्पराओं और त्योहार को डूबकर जीने वाले लोग ही गुलाबी नगरी की पहचान हैं। बाहर से आने वाले लोगों पर भी त्योहार का रंग ऐसा चढ़ता है कि वे भी यहां की संस्कृति और सभ्यता में रंग जाते हैं। होली पर शहर भर में कई आयोजन होते हैं। सिटी पैलेस के होली दहन से लेकर पारम्परिक लोक नाट्य तमाशा और गुलाल गोटे का इतिहास बहुत पुराना है। इसके अलावा ताडक़ेश्वर महादेव मंदिर के बाहर शिव भक्ति में झूमते लोग भी आपको मंत्रमुग्ध कर देंगे। इस बार आप गुलाबीनगर की होली देखना चाहते है तो चूके नहीं। जो अब तक नहीं देखा, उसे इस बार जरूर देखकर जाएं।
पीढिय़ां बदलीं, मान्यता वही...
परकोटा में होलिका दहन की शुरुआत सिटी पैलेस से होती है। पीढिय़ा बदल गईं, लेकिन मान्यता आज भी वही है। यहां परकोटा के मोहल्लों से लोग इक_े होते हैं। पूर्व राजपरिवार के सदस्य पूजा-पाठ करने के बाद होलिका दहन करते हैं। इसके बाद से यहां मौजूद लोग उस आग में डंडा जलाकर भागते हैं। ये लोग अपने मोहल्ले में रखी होली में आग लगाते हैं। यह दृश्य सालों से ऐसा ही चला आ रहा है।
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सिटी पैलेस
होलिका दहन - 01 मार्च
समय - शाम 7.41 बजे
(आवाजाही के लिए नि:शुल्क)
छोटा अखाड़ा, ब्रह्मपुरी
तारीख - 01 मार्च 2018
समय - दोपहर 1 बजे से
गुलाल गोटा फैला रहा सद्भाव के रंग...
जयपुर की स्थापना के समय महाराजा जयङ्क्षसह द्वितीय ने लखेर गांव से आए कारीगरों को आमेर से मनिहारों का रास्ता में बसाया था। लाख से निर्मित गुलाल गोटे से एक समय राजपरिवार के सदस्य ही होली खेलते थे, अब इसकी पहुंच आम लोगों तक है। राजपरिवार के सदस्य हाथी पर सवार होकर प्रजा पर गुलाल गोटा फेंक होली खेलते थे। आज अमरीका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया में भी यहां के गुलाल गोटे की मांग है। कारीगर इसमें प्राकृतिक सुगंधित गुलाल भरते हैं। वजन करीब 15 ग्राम होता है।
250 साल पुरानी तमाशा शैली...
250 साल पुराने तमाशे से जुड़े लोग इसके अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें संगीत की विभिन्न राग-रागिनियों के माध्यम से कहानियों और लोक कथाओं का वर्णन किया जाता है। जिनमें हीर-रांझा के सात्विक प्रेम प्रसंग को दिखाया जाता है। इसमें महिलाओं का पात्र भी पुरुष ही निभाते हैं।
Published on:
28 Feb 2018 03:09 pm
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