
फसली उत्सव के रूप में मनाया जाती होली
प्रतापगढ़ जिले के आदिवासी अंचल में होली का त्यौहार एक फसली उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसकी शुरुआत आवली एकादशी से होती है। आवली एकादशी के दिन बेटे और बेटियां पूरा दिन व्रत करते हैं। शाम पांच बजे के समय नदी के पानी में आवले का झाड़ लगाकर उसके चारों और चक्कर लगाते हुए गेहूं, मक्का, धान,जौ आदि अनाज को उस झाड़ पर अर्पण किया जाता है और व्रत खोला जाता है। उस दिन से आदिवासी अचंल में फसली त्योहार होली की शुरुआत हो जाती है,जो दस दिनों तक चलती है। खास कर इस क्षेत्र में होली की धूम धुलंडी से शुरू होती है। जिसमें मुख्य रूप से गैर खेली जाती है। धुलंडी के एक दिन पहले होली जलाई जाती है वहां पूरा गांव एकत्रित होता है और एक दूसरे के गले मिलकर एक दूसरे का अभिवादन करते है। फिर होली के चारोंं ओर गैर खेली जाती है। उसके बाद पूरी गैर गांव में घूमती है। गांव में एेसे घर जहां नई शादी होती है या पहला बच्चा होता है उसके घर गैर खेली जाती है। यदि गांव में किसी के घर मौत हो जाती है तो पूरी गैर पांच मिनट का मौन रखकर मरने वाले व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए मौन धारण करता है। इस दिन आदिवासी समुदाय के लोग पेड़ों की परिक्रमा कर के पेड़ों की सुरक्षा का भी संकल्प भी लेते हैं।
Published on:
09 Mar 2020 03:04 pm
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