
खाप पंचायतें दिखाती honor killing की राह, अब लटकेगा कानूनी शिकंजा
जयपुर। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ( Rajasthan CM Ashok Gehlot ) की अध्यक्षता में सोमवार को हुई केबिनेट की बैठक में विधानसभा ( Rajasthan Vidhansabha ) में रखे जाने वाले विधेयकों को मंजूरी के साथ ही ऑनर किलिंग ( honor killing ) को लेकर विधेयक लाए जाने को स्वीकृति दी गई। बताया जा रहा है कि राज्य सरकार ऑनर किलिंग विधेयक-2019 इसी सत्र में लाने को लेकर लगभग तैयारी कर चुकी है।
आॅनर किलिंग के साथ ही आजकल हम जो शब्द सबसे ज्यादा सुन रहे हैं वो है खाप पंचायत ( khap panchayat ) ... आॅनर किलिंग की खबरों में खाप पंचायतों ( khap panchayat honour killing ) की भूमिका सुनकर ही इसके दबदबे का अंदाजा लगाया जा सकता है। क्या है ये खाप पंचायतें, क्यों है खाप पंचायतों का इतना दबदबा, कितना पुराना है खाप पंचायतों के 'न्याय' का ये सिलसिला... आइए आज इसका 'शाब्दिक' के साथ ही 'सामाजिक अर्थ' भी आपको बताते हैं।
चलिए पहले इसका शाब्दिक अर्थ जान लें— खाप शब्द दो शब्दों ख और आप से बना है। इनमें ख का मतलब आकाश और प का मतलब पानी है। दोनों को मिला कर समझें तो मतलब निकलता है आकाश की तरह अग्रगण्य और पानी की तरह निर्मल। ऐसा फैसला जो न्यायसंगत हो। खाप का मतलब ये भी है कि ऐसा न्याय जो सबके लिए आसानी से उपलब्ध हो। लेकिन आज इसके अर्थ का कई टुकड़ों में विभाजन कर दिया गया है।
दूसरे शब्दों में हम खाप को एक सोशल एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम के रूप में समझ सकते हैं। खाप पंचायतें एक गोत्र या जाति के लोग मिलकर बनाते हैं। इस पंचायत में एक ही गोत्र या जाति के पांच, बीस या पच्चीस गांव शामिल हो सकते हैं। हालांकि इन पंचायतों को कानूनी मान्यता नहीं है। लेकिन ये पंचायतें कानून से उपर उठकर फैसले देती हैं। खाप पंचायतें उत्तर भारत में ज्यादा प्रचलित हैं। इनमें राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य प्रमुख हैं।
इस तरह फैसला देती हैं खाप पंचायतें
खाप पंचायतों में गोत्र या जाति विशेष के लोग होते हैं। एक खाप में 25 गांव तक शामिल हो सकते हैं। खास बात ये कि जो गोत्र ज्यादा प्रभावशाली होता है, उसकी चलती है। ऐसे लोग भी खाप में शामिल होते हैं, जिनकी गोत्र की जनसंख्या कम है, लेकिन फिर उनका दबदबा भी कम होता है। हालांकि किसी भी मामले को हल करने के लिए सभी गांवों के लोगों को बुलाया जाता है। फैसला भी सबके समर्थन से लिया जाता है। सर्वसम्मति से लिया गया ये फैसला सबके लिए मान्य होता है, कोई इससे इंकार नहीं कर सकता है। यानी खाप के विरोध में नहीं जा सकता।
गौरतलब है कि ये खाप पंचायतें पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रचलित हैं। यहां जाति विशेष के लोगों में खाप पंचायतों में ही फैसले लेने की पंरपरा है। खास तौर पर जिन जातियों के पास काफी जमीन जायदाद है और जिनका स्थानीय प्रशासन और राजनीति में भी प्रभाव है। वहां इन पंचायतों का दबदबा और प्रभुत्व है।
औरतें और युवा नहीं होते हिस्सा
खाप पंचायतों का हिस्सा औरतें और युवा नहीं होते। इनका नेतृत्व बुजुर्ग और प्रभावशाली लोगों के पास होता है। औरतों का तो कोई प्रतिनिधि भी नहीं होता। इसमें सिर्फ पुरूष शामिल होते हैं। वे ही फैसले लेते हैं। युवा वर्ग को भी यहां बोलने का हक नहीं होता। ये पंचायतें पारंपरिक हैं, इसलिए आज हिंदुस्तान में खाप पंचायत अपने घटते प्रभाव को लेकर परेशान है और असुरक्षा की भावना से घिर गई है। इसीलिए खाप पंचायतें संवेदनशील और भावुक मुद्दों को उठाती हैं ताकि उन्हें आम लोगों का समर्थन प्राप्त हो सके। फिर वे इसमें सफल भी होती हैं।
इस तरह के केसों में होती है सुनवाई और फैसले
इन खाप पंचायतों में पिछले कुछ समय में जो मामले सामने आए हैं उनमें सिर्फ भागकर शादी करने के मामले शामिल नहीं है। कई ऐसे मामले हैं, जहां मां बाप शादी के लिए राजी होते हैं, लेकिन पंचायत गोत्र के आधार पर उन्हें नामंजूर कर देती है। ये पंचायतें शादी के मामले में यदि खाप पंचायत को कोई आपत्ति हो तो वे युवक और युवती को अलग करने, शादी को रद्द करने, किसी परिवार का सामाजिक बहिष्कार करने या गांव से निकाल देने और कुछ मामलों में तो युवक या युवती की हत्या तक का फैसला करती हैं।
हालांकि अब अशोक गहलोत सरकार ऑनर किलिंग विधेयक-2019 लाकर खाप पंचायतों पर कानूनी शिकंजा कसने की तैयारी में है।
Updated on:
30 Jul 2019 12:45 pm
Published on:
30 Jul 2019 12:42 pm
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