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अरल सागर कैस बन गया मरूस्थल…अब हराभरा बनाएगा उज्बेकिस्तान

Aral Sea : 10 लाख हैक्टेयर में सूखे को झेलने वाले पौधों को लगाया जाएगा...-अरल या अराल सागर मध्य एशिया की झील है, लेकिन बड़े आकार के कारण इसे सागर कहा जाता है।

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अरल सागर कैस बन गया मरूस्थल...अब हराभरा बनाएगा उज्बेकिस्तान

अरल सागर ने करीब 55 लाख हैक्टेयर से अधिक क्षेत्र खो दिया।

नई दिल्ली. उज्बेकिस्तान में अरल सागर का बड़ा हिस्सा आज अरलकुम रेगिस्तान बन चुका है। कभी यहां मत्स्य पालन होता था और बंदरगाह भी थे, लेकिन अब दसवां हिस्सा ही बचा है। 1960 के दशक तक रेगिस्तान का वजूद नहीं था। उस वक्त यह दुनिया की चौथी सबसे बड़ी समुद्री झील था, लेकिन अब इसमें करीब 55 लाख हैक्टेयर से अधिक क्षेत्र खो दिया। जो हिस्सा बचा, उसका पानी मृत सागर की तरह खारी है। अरल या अराल सागर मध्य एशिया की झील है, लेकिन बड़े आकार के कारण इसे सागर कहा जाता है।

कैसे सूखा
सोवियत काल के वक्त यह इतिहास की सबसे खराब जलवायु त्रासदियों में से एक थी। तब इसमें मिलने वाली दो नदियों अमु दरिया और सीर दरिया को सिंचाई के लिए कपास के खेतों में मोड़ दिया गया। धीरे-धीरे फसलों को पानी तो मिला, लेकिन झील का दायरा सिकुड़ता गया। वर्षा की कमी के बाद करीब 55 लाख हैक्टेयर का क्षेत्र सूखे में बदल गया।

जहरीली धूल बनी सेहत की दुश्मन
कपास की खेती के लिए किसानों ने इसमें काफी मात्रा में रसायनों और उर्वरकों का इस्तेमाल किया था, जो धीरे-धीरे अरल के पानी में मिलता रहा। अरल सागर का पानी वाष्पित होकर उड़ गया, लेकिन रसायन मिट्टी में ही रहे। नतीजा मिट्टी के साथ उडकऱ रसायन भी आबादी क्षेत्रों में जाने लगा। पानी की कमी और जहरीली धूल ने लोगों को बीमार करना शुरू कर दिया।

सक्सौल पौधे का प्रयोग
मुख्य क्यूरेटरर जिनोवी नोत्स्किी ने बताया कि दिनों दिन बढ़ रहे इस रेगिस्तान को रोकने के लिए सक्सौल झाड़ी प्रमुखता से लगाई जा रही है। यह लंबे समय तक सूखा झेल सकती है और हवा के साथ नमक और रसायनों को उडऩे से भी रोकेगी। एक अनुमान के मुताबिक हर साल रेतीला तूफान यहां 100 मिलियन टन से अधिक उर्वरक और कीटनाशक तत्व हवा में उड़ा देता है।

क्या उपाय किए जा रहे हैं
यों तो उज्बेकिस्तान अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की वित्तीय और तकनीकी मदद से क्षेत्र को हराभरा बनाने के लिए कुछ वर्षों से काम कर रहा है। वनस्पति विशेषज्ञों ने कुछ ऐसी प्रजातियां खोजी हैं, जिन्हें न केवल पानी की कम आवश्यकता होगी, बल्कि रेगिस्तान की मिट्टी और नमक को आबादी क्षेत्रों तक जाने से भी रोकेगी। वनस्पतिशास्त्री नतालिया और अजमत एक यहां एक दशक तक अध्ययन करने के बाद बताया कि कुछ पौधों और घास की प्रजातियां मधमुक्खियों और अन्य कीटों को आकर्शित करेंगी, जिससे जैव विविधता फिर समृद्ध होगी।

एक्सपर्ट....
तीन स्टेशन करेंगे हरियाली की निगरानी
हमारा लक्ष्य हरियाली के साथ ही पारिस्थितिक तंत्र को बहाल करना भी है। इसके लिए 10 लाख हैक्टेयर में ऐश, एल्म, विलो और कैटालपा के पेड़ लगाए जा रहे हैं। ये मिट्टी के कटाव को भी रोकेंगे। अरल वाले जिले मुयनाक में तीन मौसम स्टेशन भी बनाए जाएंगे, जो मौसम की जानकारी के साथ हरियाली प्रक्रिया की निगरानी में भी मदद करेंगे। इसके लिए भुगतान अमरीका की एजेंसी यूएसएआइडी करेगी।
-बखिदजान खबीबुलेव, इटरनेशनल इनोवेशन सेंटर के निदेशक (अरल ग्रीन प्रोजेक्ट को देख रहे हैं )