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कैसे चुनेंगे अपना अध्यक्ष,विश्वविद्यालय नहीं देता उम्मीदवारों को सुनने का मौका

छात्रनेताओं ने कहा होनी चाहिए प्रेजिडेंशियल डिबेट,विद्यार्थियों ने कहा तभी रूकेगा धनबल,बाहुबल का प्रयोग

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जयपुर
जेएनयू,दिल्ली,पटना विश्वविद्यालय की तर्ज पर अब राजस्थान विश्वविद्यालय का विद्यार्थी और छात्रनेता भीप्रेजिडेंशियल डिबेट की मांग करने लगा है। डिबेट को लेकर कई बार छात्र संगठन विश्वविद्यालय प्रशासन को लिख चुका है लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने अभी तक डिबेट के लिए हां नहीं भरी है। विश्वविद्यालय में भारी पुलिस जाब्ते का बंदोबस्त होने के बाद भी विश्वविद्यालय प्रशासन चुनावों से पहले डिबेट करवाने से ड़र रहा है। जबकि विद्यार्थी अपना छात्रसंघ अध्यक्ष चुनने से पहले और वोट ड़ालने के लिए यह जानना चाहते है कि वह जिस प्रत्याशी को वोट करेगा वह उनके लिए क्या कर सकते है।
समय कम मिला,ना विद्यार्थी जान सकें नेता को ना नेता विद्यार्थी को
उच्च शिक्षा विभाग ने सोमवार को छात्रसंघ चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया। जिसके बाद बुधवार से चुनावों की अधिसूचना जारी कर आचार संहिता लागू कर दी गई। चुनावों की तिथि घोषित नहीं होने के कारण छात्रनेताओं की सक्रियता भी काफी कम हो गई थी। ऐसे में अब चुनावों की तिथि घोषित होने के बाद अवकाशों के कारण केवल चुनावों के लिए एक सप्ताह से भी कम का समय मिला है। ऐसे में छात्रनेताओं का कहना है कि एक सप्ताह में टिकट के लिए भागदौड़,नॉमिनेशन भरना सहित अन्य कामकाज भी होेंगे ऐसे में पांच दिन से भी कम का समय ही मिल पाएगा। ऐसे में डिबेट होनी चाहिए जिससे की विद्यार्थी यह जान सकें कि वह जिसको चुनना चाहते है वह उनके मुददें पूरे कर पाएगा या नहीं। अभी कम समय मिलने से ना विद्यार्थी नेता को जानते है और ना ही नेता विद्यार्थियों के बीच पहुंच सका है।
ऐसे होती है प्रेजिडेंशियल डिबेट
अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों में व देश के अन्य विश्वविद्यालयों में चुनावों से पहले प्रेजिडेंशियल डीबेट होती है। इस डिबेट में चुनाव में नामांकन भर अपनी दावेदारी जताने वाले उम्मीदवार को उनके वोटर्स के सामने उन मुददों को पेश करना होता है जिन मुददों को लेकर वह चुनाव लड़ रहे हैं। उम्मीदवार डिबेट में अपने मुद्दों को अपने तर्कों के जरिए प्रस्तुत करते हैं। इसके साथ ही विद्यार्थी भी अपने होने वाले छात्रसंघ अध्यक्ष से किसी भी मुददें पर सवाल कर उसके समाधान के लिए उससे जवाब देते है।
इनका यह कहना
प्रेजिडेंशियल डिबेट होनी चाहिए जिससे आम छात्र को यह पता लग सके की कौन चुनाव लड़ रहा है। साथ ही जिसको हम वोट दे रहे है उसमें लीडरशिप के गुण है या नहीं। वह हमारा नेतरत्व करने में कितना सक्षम है और वह हमारे मुददों को उठा सकता है या नहीं।
रमेश कुमार,छात्र
चुनाव से पहले प्रेजिडेंशियल डिबेट होनी चाहिए। कई बार वीसी को ज्ञापन दिया है लेकिन वह लड़ाई झगड़े के ड़र से डिबेट नहीं करवाना चाहते है। वीसी को विद्यार्थियों के बीच आकर जानना चाहिए कि विद्यार्थी क्या चाहता है। डिबेट होने से धनबल का प्रयोग कम होगा।
जसविंदर चौधरी,प्रवक्ता एनएसयूआई
विश्वविद्यालय कॉलेज में पढ़ने के लिए टॉपर स्टूडेंट आता है। वह चाहता है कि हमारे बीच का कोई विद्यार्थी हमारा नेतरत्व करें। ऐसे में डिबेट होने से विश्वविद्यालय को मजबूत और दमदार छात्र प्रतिनिधि मिलेगा।
अभिमन्यू पूनियां,प्रदेशाध्यक्ष एनएसयूआई
विश्वविद्यालय प्रेजिडेंशियल डीबेट जैसा कोई प्लेटफॉर्म उपलब्ध करवाता है तो इससे फिजुलखर्ची पर तो रोक लगेगी ही साथ ही संविधान के अनुसार भी स्वच्छ चुनाव हो सकेंगे।
संजय माचेडी,पूर्व अध्यक्ष पद प्रत्याशी,एबीवीपी
पांच हजार रुपए के खर्च में होने वाले चुनावों का खर्चा लाखों करोड़ों तक पहुंच जाता है। डिबेट नहीं होने से छात्रनेता विद्यार्थियों तक पहुंच ही नहीं पाता है कई बार प्रशासन को डिबेट के लिए कह चुके हैं।
अमित कुमार बड़बडवाल,एबीवीपी

टिकट को लेकर मंथन शुरू

एबीवीपी और एनएसयूआई के छात्रसंघ कार्यालयों में प्रत्याशियों के टिकट वितरण को लेकर मंथन शुरू हो गया है। संगठन के पदाधिकारी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए जीत दिलाने वाले प्रत्याशी को टिकट देने को लेकर चर्चा कर रहे है। वही जातिगत समीकरण के आधार को भी टिकट वितरण के लिए समीकरण तय करने में जुटे हुए हैं।