जयपुर। सभी को घर (हाउस फॉर ऑल) उपलब्ध कराने और व्यापारिक, औद्योगिक गतिविधियों को बूस्टअप करने की मुहिम को अव्यवहारिक डीएलसी दर से झटका लग रहा है। जमीन की बाजार कीमत और डीएलसी दर में लगातार असंतुलन कारण ऐसा हो रहा है। हालात यह है कि शहरों के बड़े इलाकों में कई जगह जमीन की बाजार दर तो कम है और डीएलसी रेट दो से चार गुना ज्यादा। इनमें कॉमर्शियल प्रॉपर्टी के मामले ज्यादा है। नतीजा, जमीन-मकान-ऑफिस की रजिस्ट्री कराने वालों को न केवल ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ रही है, बल्कि आयकर नोटिस तक सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद राज्य सरकार बाजार कीमत और डीएलसी दर में गहराए अंतर को पाटने के लिए होमवर्क नहीं कर रही।
इस तरह समझें
1. लोहा मण्डी, सीकर रोड- यहां बाजार दर 25 हजार रुपए प्रति वर्गमीटर है, जबकि डीएलसी 50 हजार रुपए प्रति वर्गमीटर है।
असर- प्रॉपर्टी खरीदने और बेचने वाले दोनों से आयकर विभाग 30 प्रतिशत की दर से टैक्स वसूलता है। यदि भूखंड साइज 500 वर्गमीटर है तो 15000 रुपए प्रति वर्गमीटर के हिसाब से दोनों भूखंडधारियों को टैक्स देना होगा। इस मोटे टैक्स से बचने के लिए लोग रजिस्ट्री कराने से बचते हैं।
2. कॉमर्शियल ऑफिस, एमआई रोड- यहां प्रॉपर्टी खरीद दर करीब 8000 रुपए प्रति वर्गफीट है, जबकि डीएलसी दर 14000 रुपए वर्गफीट तय की गई है।
असर- खरीददार पर रजिस्ट्री का ज्यादा बोझ पड़ रहा है। यदि रजिस्ट्री नहीं कराते हैं तो सरकार को राजस्व का नुकसान।
3. जयसिंहपुरा, अजमेर रोड- यहां कृषि श्रेणी की जमीन का बाजार भाव 25 हजार रुपए प्रति वर्गमीटर है, जबकि यहां डीएलसी दर 6000 रुपए प्रति वर्गमीटर ही है।
असर- इस एरिया में जो भी जमीन का सौदा हो रहा है, उसमें से 93 प्रतिशत मामलों में रजिस्ट्री हो रही है। क्योंकि, डीएलसी दर कम होने से रजिस्ट्री शुल्क भी कम लग रहा है। लोगों को तो फायदा है लेकिन सरकार को राजस्व नुकसान ा पड़ रहा है।
बड़ सवाल – हर एरिया में डीएलसी दर 5 प्रतिशत बढ़ाई, क्या हर जगह एक समान है स्थिति ?
इस वर्ष सभी प्रकार की संपत्तियों (कृषि, आवासीय व व्यावसायिक) की डीएलसी दर 5 प्रतिशत बढ़ाई गई। सवाल यह है कि क्या एक शहर के सभी इलाकों में सम्पत्ति की दर समान रूप से घटी या बढ़ती है। ऐसे में सभी जगह डीएलसी दर 5 प्रतिशत बढ़ाने का औचित्य समझ से परे हैं। सरकार सर्वे कराकर हकीकत पता करने की बजाय औपचारिकता पूरी कर रही है।
मौजूदा हालात मेंं इसकी भी जरूरत
-व्यावसायिक डीएलसी दर वर्तमान में आवासीय दरों से 2 गुना से ज्यादा नहीं हो। निकायों द्वारा रिजर्व प्राइस का निर्धारण भी इसी अनुपात में हो सकता है।
-कॉर्नर भूखंड की डीएलसी दर 10 प्रतिशत ज्यादा तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि कॉर्नर भूखंड होने की वजह से उस प्लॉट पर निर्माण सामान्य भूखंड से कम होता है।
-बहुमंजिला इमारतों की फ्लोरवाइज डीएलसी की वर्तमान दर की समीक्षा हो। अलग-अलग गणना होने से यह भूमि की कुल डीएलसी लागत से 150 से 200 प्रतिशत से अधिक हो जाती है।
टॉपिक एक्सपर्ट – के.सी. परवाल
राजस्थान में कई वर्षों से डीएलसी दर निर्धारण के लिए धरातल पर कोई सर्वे नहीं किया गया। वर्तमान में जो डीएलसी दर निर्धारित है, उनमें कुछ प्रतिशत जोड़कर या घटाकर इतिश्री कर ली जा रही है। इससे न केवल लोगों की परेशानी बढ़ी है, बल्कि राज्य सरकार को भी अरबों रुपए की राजस्व हानि हो चुकी है। आयकर कानून में इनकम टैक्स या कैपिटल गेन टैक्स वसूल करने का आधार सर्किल रेट को माना गया है। यहां डीएलसी दर ही सर्किल रेट है। ऐसी स्थिति में विक्रेता को डीएलसी दर अधिक होने के कारण अंतर की राशि पर अतिरिक्त आयकर चुकाना पड़ रहा है।