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98 साल के दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की जुबानी, जानिए आजादी के संघर्ष की कहानी

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98 साल के दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की जुबानी, जानिए आजादी के संघर्ष की कहानी

जया गुप्ता / जयपुर। स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में हम पाठकों को ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों से रूबरू कराएंगे जिन्होंने हमें आजादी दिलाने में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। 'दे दी हमें आजादी' की इस श्रंखला में हम स्वतंत्रता सेनानियों के अनुभव, उनके विचार से उन्हीं की जुबानी बताएंगे। इस कड़ी में आज के हमारे स्वतंत्रता सेनानी हैं 98 वर्षीय दुर्गाप्रसाद अग्रवाल।

जब 11 मई 1939 को भरतपुर में सत्याग्रह आंदोलन शुरू हुआ, हाथ में झंडा लेकर घूमते थे। देश को आजाद कराना इतनी बड़ी जिम्मेदारी है, इसका अंदाजा भी नहीं था। फिर भरतपुर में प्रजामंडल का सदस्य बना और धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाने लगा। जेल भरो आंदोलन भरतपुर रियासत में बहुत प्रभावी चला। वहां यह आंदोलन मैं और मास्टर आदित्यनाथ, दोनों ही चला रहे थे। मास्टर आदित्यनाथ पैसे का इंतजाम करते और मैं गांवों से सत्याग्रही लाता। रोजाना 10-12 सत्याग्रहियों को जेल भेजते।

हर सप्ताह लक्ष्मण मंदिर में 7 सत्याग्रही और एक डिक्टेकर एकत्र होते और हाथ में झंडा लेकर भारत माता की जय का नारा लगाते हुए आगे बढ़ते। थोड़ा आगे चलते ही पुलिस पकड़ लेती। हम ध्यान रखते कि डिक्टेकर को पुलिस नहीं पकड़ पाए। सत्याग्रहियों को गांव से लाने सहित भोजन-आवास का इंतजाम मैं ही करता था। महिलाओं से आटा मांगकर लाता और सत्याग्रहियों को खाना खिलाता। भरतपुर का सत्याग्रह आंदोलन दिल्ली में भी बहुत सराहा गया।

नेहरुजी ने हमारे लिए संदेश भेजा कि मास्टर आदित्यनाथ और दुर्गाप्रसाद से कहो कि जेल जाने से बचें। एक दिन मैंने युगलकिशोर चतुर्वेदी को भी कहा कि चौबेजी जेल कब जाओगे? चौबेजी बोले घर में आज के लिए भी आटा नहीं है, इंतजाम कर दो तो आज ही चला जाऊं। मैंने एक बोरी अनाज उनके घर भिजवाया। देश आजाद हुआ तो मुझे मंत्री बनने के लिए बहुत कहा गया। अच्छा हुआ, मंत्री नहीं बना। देश अंग्रेजों से तो आजाद हो गया मगर अब हिंदुस्तानी ही राज करने लगे हैं। गांधी का ग्राम स्वराज्य आज भी साकार नहीं हो पाया।