
साथियों के साथ पत्थर ढो-ढोकर 1500 रुपए किए एकत्र, गांधीजी को की थी आर्थिक मदद
जयपुर। दे दी हमें आजादी की आज की कड़ी में हम आपको रूबरू करा रहे हैं 93 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी श्रीकृष्ण चंद से। जिन्होंने गांधीजी को आर्थिक मदद की। जानिए पूरी कहानी उन्हीं की जुबानी :
बात 1942 की है, जब दिल्ली के चांदनी चौक में युवाओं ने आंदोलन किया। ब्रिटिश हुकूमत ने मुझे गिरफ्तार कर लिया। तब मैं 17 साल का था। मुझे रातभर कोतवाली थाने में रखा और अगली सुबह ट्रेन से लाहौर की बच्चा जेल में भेज दिया। मैं 18 साल का हुआ तब वहां से करीब 3 माह के लिए मुझे पंजाब की एक जेल में शिफ्ट कर दिया गया। वहां 6 माह की सजा काटने के बाद जेल से बाहर आया। इन 6 माह में जेल में कई गुमनाम चेहरों से मेरी मुलाकात हुई और आजादी का मतलब समझ में आया। बाहर निकलने के बाद आजादी की लड़ाई में सक्रिय हुआ।
हरिद्वार के गुरुकुल कांगरी में आगे की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया और वहां मेरा गांधीजी से मिलना हुआ। बाद में साबरमती में भी गांधीजी से मुलाकात हुई। जब गांधीजी देश में आन्दोलन चला रहे थे। उस समय गुरुकुल कांगड़ी के छात्रों ने डैम में पत्थर उठा कर 1500 रुपए एकत्र किए। ये पैसे गांधीजी को भिजवाए गए थे। इसके बाद जब भी गांधीजी आते तो वे गुरुकुल कांगड़ी जरूर आते थे। देश आजाद हुआ तब मैं गुरुकुल कांगरी में था और पता चला तो सभी बहुत खुश थे। जयपुर में 1950 के आसपास आया। ससुर स्वतंत्रता सेनानी जमुनाप्रसाद मथुरिया भी गांधीजी के करीबी थे। मेरी पत्नी का जन्म साबरमती आश्रम में ही हुआ था।
लेकिन आज देश की स्थितियां ठीक नहीं लगतीं। सरकारी शिक्षा का स्तर गिर रहा है। राजनीतिक दलों का माहौल ठीक नहीं है। नागरिक सुविधाएं खत्म हो रही हैं। समाज में वैचारिक संबंध खत्म हो रहे हैं। मौजूदा दौर के नेता खुद को देश के नागरिकों से ऊपर समझने लगे हैं। तब ब्रिटिश सरकार पर हमारा पैसा निकलता था लेकिन आज हम विदेशियों के कर्जदार हो गए हैं।
Published on:
08 Aug 2018 08:58 pm
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