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लोकतंत्र के लिए कितना मुफीद माल-ए-मुफ्त?

क्या ये है वोट बटोरू फॉर्मूला

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जयपुर

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Anoop Singh

Sep 07, 2018

Jaipur

लोकतंत्र के लिए कितना मुफीद माल-ए-मुफ्त?


राजस्थान में मतदाताओं के लिए मुफ्त उपहार की सियासी बौछारें भी शुरू हो गई हैं। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने मतदाताओं को लुभाने के लिए एक करोड़ मोबाइल फोन देने का ऐलान किया है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा में पंजीकृत एक करोड़ लोगों को मोबाइल फोन और डाटा के लिए 1000 रुपए नकद देने की घोषणा की है। कांग्रेस ने भी बेरोजगारों पर फोकस कर वादा किया है कि सत्ता में आए तो 3500 रुपए का भत्ता देंगे। राजस्थान के साथ वर्ष के अंत में चुनावी समर में जान वाले मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी मुफ्त किताबों से लेकर स्मार्टफोन तक के वायदे किए जा रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मतदाताओं के लिए ये माल-ए-मुफ्त कितना जायज है। आज भी क्या मतदाताओं को लुभाने के लिए घोषणाओं का सहारा लेना पड़ता है। देश के दक्षिणी राज्यों से शुरू हुआ वोट बटोरने का ये फॉर्मूला कभी पास तो कभी फेल होता है। यानी इसकी सक्सेस रेट फिफ्टी-फिफ्टी है। दक्षिण में तो पंखे, कूलर, गैस स्टोव तक राजनीतिक पार्टियों ने मतदाताओं को बांटे हैं। सत्ता भी पायी। हां चावल और यहां तक खाने का तेल भी दिया। पिछली बार पंजाब के चुनाव में कांग्रेस ने सब्सिडी वाले घी तक की घोषणा की थी।

वादों का तंत्र, मुद्दे गौण
चार-साढ़े चार साल तक सत्ता का सुख भोगने के बाद आखिरी साल-छह महीने में सरकारों द्वारा मुफ्त माल की घोषणा करना अब परिपाटी बन गया है। लेकिन क्या ये गलत है। तकनीकी रूप से देखें तो, नहीं। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि कल्याणकारी चीजों जैसे मुफ्त अनाज, कर्ज माफी तथा उपभोक्ता वस्तुओं के बीच भेद होना चाहिए। दूसरे शब्दों में कल्याणकारी वस्तुओं को देने से ऐतराज नहीं। उधर चुनाव आयोग ने पिछले समय राजनीतिक पार्टियों की बैठक बुलाकर इस बारे में गाइडलाइंस बनाने का सुझाव दिया था। लेकिन कोई भी पार्टी इस प्रकार की गाइड लाइंस में बंधना नहीं चाहती है। यानी अभी वादों का तंत्र चलेगा, मुद्दे गौण रहेंगे।