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जयपुर। कहते हैं कि एक मां अपने बच्चे की ढाल होती है, लेकिन जब नियति किसी बच्चे की दुनिया को 'ऑटिज्म' के सन्नाटे से भर दे, तो वही मां उसके लिए पूरी कायनात बन जाती है। जयपुर की डॉ. नम्रता बडेसरा और मीना राजपूत की कहानी महज समाजसेवा नहीं, बल्कि ममता के उस संघर्ष की दास्तां है जिसने व्यक्तिगत पीड़ा को सैकड़ों परिवारों की उम्मीद में बदल दिया।
ऐसी ही एक और मिसाल मीना राजपूत हैं। जब उनकी बेटी मात्र 9 महीने की थी, तब उन्हें पता चला कि वह 'सीवियर ऑटिज्म' से ग्रस्त है। बेटी को पढ़ाने के लिए मीना ने कई स्कूलों के चक्कर काटे, लेकिन कहीं जगह नहीं मिली। इस ठुकराहट ने उन्हें एक नई राह दिखाई। उन्होंने अपने घर के दरवाजे उन बच्चों के लिए खोल दिए जिन्हें समाज मुख्यधारा से अलग समझता था। आज उनके 'लक्ष्य चैरिटेबल ट्रस्ट' में ऑटिज्म और डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त 40 बच्चे निःशुल्क शिक्षा और थैरेपी पा रहे हैं। सुखद पहलू यह है कि यहां सामान्य बच्चे भी आते हैं, ताकि वे इन विशेष बच्चों के साथ घुल-मिल सकें।
डॉ. नम्रता बडेसरा का सामना जब ऑटिज्म से हुआ, तो उन्होंने हार मानने के बजाय इस शांत लड़ाई को समझने का फैसला किया। उनका बेटा आज 22 वर्ष का है। बेटे की स्थिति को गहराई से जानने और उसे बेहतर जीवन देने की जिद ने नम्रता को इस विषय पर 'पीएचडी' करने के लिए प्रेरित किया। अपने दो दशकों के अनुभव से वह कहती हैं… 'ऑटिज्म की पहचान 1 से 3 साल के बीच हो जाती है। स्पीच और बिहेवियर थैरेपी जरूरी है, लेकिन दुनिया की सबसे कारगर थैरेपी वह है जो एक मां अपने बच्चे को देती है।' आज वह अन्य अभिभावकों की काउंसलिंग कर उन्हें सिखाती हैं कि कैसे एक 'विशेष' बच्चे को आत्मनिर्भर बनाया जाए। डॉ. नम्रता ऐसे बच्चों के लिए अर्जुन संस्था चला रही हैं।
इन संस्थाओं में बच्चों को केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन जीने का सलीका सिखाया जा रहा है। त्योहारों के समय यहां का नजारा देखते ही बनता है। ये बच्चे अपने नन्हे हाथों से कलात्मक दीये, राखी, डिजाइनर लिफाफे और बैग तैयार करते हैं। इनकी बनाई वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाई जाती है, जिससे इन्हें आत्मविश्वास मिलता है।
Published on:
02 Apr 2026 07:41 pm
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