
राजस्थान की राजधानी जयपुर से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। JLN मार्ग स्थित एक कैफे में वृंदावन से आए एक आचार्य को उनकी पारंपरिक वेशभूषा यानी लुंगी और चप्पल की वजह से प्रवेश देने से इनकार कर दिया गया। इधर कैफे संचालकों की दलील है कि उनके कैफे में एन्ट्री के कुछ ड्रेस कोड हैं जिन्हें फॉलो किया जाना ज़रूरी है। कैफे का तर्क है कि यहां आने के लिए 'शूज़ और ट्राउज़र्स' पहनना अनिवार्य है। इस घटना का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिससे 'ड्रेस कोड' बनाम 'भारतीय संस्कृति' की नई बहस छिड़ गई है।
जानकारी के अनुसार, पीड़ित शख्स का नाम आचार्य सतीश कृष्णा है, जो उत्तर प्रदेश के वृंदावन के निवासी हैं। आचार्य कृष्णा भगवान श्री कृष्ण और राम के अनन्य भक्त हैं और सामान्यतः इसी सात्विक वेशभूषा (लुंगी और साधारण पहनावे) में रहते हैं। वे किसी कार्यवश वृंदावन से जयपुर आए थे और जब वे जेएलएन मार्ग स्थित एक नामी कैफे में पहुंचे, तो वहां तैनात स्टाफ ने उन्हें दरवाजे पर ही रोक दिया।
आचार्य का आरोप है कि उन्हें कैफे के अंदर जाने से सिर्फ इसलिए रोका गया क्योंकि उन्होंने जूते और पैंट नहीं पहनी थी। कैफे कर्मियों ने कथित तौर पर उनसे कहा कि यहां का नियम है कि ग्राहक केवल वेस्टर्न वेशभूषा या औपचारिक जूतों में ही आ सकते हैं। लुंगी और चप्पल में एंट्री देना कैफे की पॉलिसी के खिलाफ बताया गया।
अपनी ही संस्कृति की धरती पर हुए इस अपमान से आचार्य सतीश कृष्णा बेहद आहत नजर आए। उन्होंने मौके पर ही वीडियो बनाकर अपनी पीड़ा साझा की। एक दूसरे वीडियो में उन्होंने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम को संबोधित करते हुए कहा कि राजस्थान जैसे राज्य में, जो अपनी गौरवशाली परंपराओं के लिए जाना जाता है, वहां भारतीय वेशभूषा के आधार पर भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कैफे प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।
कैफे के फ्लोर मैनेजर विश्वजीत ने 'पत्रिका' को बताया कि वायरल हो रहे वीडियो की घटना रविवार 12 अप्रेल की है। उन्होंने बताया कि कैफे में एन्ट्री के बाकायदा ड्रेस कोड हैं जिसके लिए आचार्य को कहा गया।
वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने कैफे के इस रवैये की कड़ी निंदा की है। कई लोगों का कहना है कि भारत में रहकर भारतीय पहनावे पर पाबंदी लगाना गुलामी की मानसिकता का परिचायक है। वहीं कुछ लोगों ने इसे कैफे का निजी अधिकार बताया है, लेकिन बहुसंख्यक वर्ग आचार्य के समर्थन में खड़ा दिख रहा है। फिलहाल इस पूरे विवाद पर संबंधित कैफे की ओर से कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण या जवाब सामने नहीं आया है।
यह पहली बार नहीं है जब जयपुर या देश के किसी बड़े शहर के रेस्टोरेंट या कैफे में पारंपरिक पहनावे पर रोक लगी हो। कानूनन किसी भी सार्वजनिक सेवा प्रदाता संस्थान को वेशभूषा के आधार पर भेदभाव करने का अधिकार है या नहीं, यह एक कानूनी पेचीदगी है। हालांकि, राजस्थान की अतिथि देवो भवः की परंपरा में इस तरह की घटनाएं पर्यटन और संस्कृति की छवि को जरूर नुकसान पहुंचाती हैं।
Published on:
13 Apr 2026 03:05 pm
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