
Abhimanyu Singh Rajvi and Bhairo Singh Shekhawat -- File PIC
राजस्थान की राजनीति में रिश्तों की गहराई और सादगी के किस्से अक्सर मिसाल बन जाते हैं। ऐसा ही एक अविस्मरणीय और आंखों को नम कर देने वाला संस्मरण पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत (बाबोसा) के दोहिते और भाजपा नेता अभिमन्यु सिंह राजवी ने साझा किया है। राजवी ने जनसंघ के संगठन महामंत्री और पूर्व राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी की जयंती पर उस दौर की यादें ताज़ा की हैं, जब राजनीति में 'पद' नहीं, बल्कि 'मानवीय गरिमा' और 'आदर्श' सबसे ऊपर हुआ करते थे।
अभिमन्यु सिंह राजवी लिखते हैं कि भैरोंसिंह शेखावत, सुंदर सिंह भंडारी को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। यह सम्मान तब से शुरू हुआ था जब 1952 में भंडारी संगठन महामंत्री थे और 'हुकुम' (शेखावत जी) एक नए-नवेले विधायक थे। शेखावत चाहे राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे हों या देश के उपराष्ट्रपति, भंडारी साहब के प्रति उनका सम्मान आजीवन वैसा ही बना रहा।
अभिमन्यु राजवी ने अपनी पोस्ट का शीर्षक दिया है— 'भंडारी नाना की फ्रूटी'। उन्होंने बताया कि जब भंडारी साहब दिल्ली के अपोलो अस्पताल में अस्वस्थ थे, तब बाबोसा के आदेश पर अभिमन्यु और उनकी बहन मूमल प्रतिदिन उनका हालचाल जानने जाते थे।
राजवी लिखते हैं, "चाहे अस्पताल हो या घर, जैसे ही हम भंडारी साहब के पास पहुँचते, वे तुरंत हमारे लिए एक फ्रूटी मँगवाते। वह फ्रूटी हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी थी।" यह उस महान राजनेता का बच्चों के प्रति निस्वार्थ स्नेह था, जिसने अपनी पूरी जिंदगी देश और संगठन के नाम कर दी थी।
इस संस्मरण का सबसे भावुक हिस्सा वह है जब एक बार भंडारी साहब ने शेखावत जी के सामने भावुक होकर कहा— "ये बच्चे (अभिमन्यु और मूमल) ज़रूर रोज़ मुझे संभालने आते हैं।" इस पर बाबोसा ने अपने चिर-परिचित मज़ाकिया अंदाज़ में कहा— "आप ही के तो बच्चे हैं भाईसाहब... और वैसे भी आपने भी तो इन्हें फ्रूटी का लालच दे रखा है।"
शेखावत जी की इस बात पर भंडारी साहब ने जो जवाब दिया, वह आज भी अभिमन्यु राजवी के कानों में गूंजता है। भंडारी साहब ने कहा था: “अब और देने के लिए मेरे पास है ही क्या भैरोंसिंह जी?”
अभिमन्यु राजवी लिखते हैं कि एक व्यक्ति जो कई मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों का गुरु रहा, वह अपनी अंतिम अवस्था में कह रहा है कि उसके पास देने के लिए 'फ्रूटी' के अलावा कुछ नहीं बचा। यही एक आदर्श स्वयंसेवक का जीवन होता है। उन्होंने कबीर दास जी की पंक्तियों “ज्यूँ की त्यूँ धर दीनी चदरिया” के माध्यम से भंडारी साहब को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उन्होंने अपना जीवन पूरी शुद्धता और त्याग के साथ जीया।
यह किस्सा केवल एक परिवार की यादें नहीं हैं, बल्कि राजस्थान की उस राजनीतिक संस्कृति की झलक है जहाँ मतभेद हो सकते थे, लेकिन मनभेद नहीं। सुंदर सिंह भंडारी और भैरोंसिंह शेखावत के रिश्तों की यह कहानी आज के दौर के राजनेताओं के लिए एक दर्पण की तरह है।
Updated on:
13 Apr 2026 01:12 pm
Published on:
13 Apr 2026 12:20 pm
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