
Hostel Security : पीजी-हॉस्टल की सुरक्षा के लिए तैयार हुए ऐप (फोटो-एआई)
जयपुर। राजधानी जयपुर समेत प्रदेश भर में हजारों की संख्या में पीजी व हॉस्टल्स बेतरतीब तरीके से खुले हुए हैं। इनके पंजीकरण को लेकर जितने प्रयास किए जाने थे वे अभी तक नहीं किए गए, यही वजह है कि इन पीजी हॉस्टल्स में कौन रह रहा है इस पर नकेल नहीं कसी जा सकी है। महीने भर के किराए से लेकर दिनों के हिसाब तक, जैसा किराएदार वैसा किराया की तर्ज पर इनका संचालन किया जा रहा है। यही वजह है कि जब कोई बड़ी घटना या आपराधिक वारदात में इन हॉस्टल्स का कनेक्शन जुड़ता है, तो सब एक दूसरे का मुंह ताकते नजर आते हैं।
एक अनुमान की मानें तो जयपुर व आसपास के क्षेत्र में 10 हजार से अधिक पीजी व हॉस्टल्स संचालित किए जा रहे हैं। इनमें गलियों में चलने वाले छोटे पीजी से लेकर 50 से 100 की क्षमता वाले बड़े हॉस्टल्स भी संचालित हैं। इन हॉस्टल्स में कौन स्टूडेंट्स रह रहे हैं, वे कब आते हैं, कब जाते हैं, उनसे मिलने कौन आता है। उनके द्वारा प्रदान किए गए डॉक्यूमेंट सही हैं या नहीं, उनका जुड़ाव किसी अपराधिक गतिविधियों में तो नहीं हैं, इसका परीक्षण करने वाला कोई मैकेनिज्म ऑटमैटिक मोड पर कार्य नहीं कर रहा है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि तेजी से शहरीकरण और बढ़ते माइग्रेशन के इस दौर में PG और हॉस्टल सेक्टर को एक सुरक्षित, पारदर्शी और डिजिटल संरचना की आवश्यकता है। विशेषज्ञ डॉ. संजय खंडेलवाल मानते हैं कि तकनीक के इस युग में किरायेदारों के दस्तावेज डिजिटल रूप से सुरक्षित रखे जा सकते हैं। प्लेटफॉर्म में DigiLocker आधारित eKYC सिस्टम जोड़ा जाता है, जिससे पहचान सत्यापन की प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय और तेज हो जाती है।
इससे फर्जी दस्तावेजों की संभावना कम होती है और वास्तविक पहचान सुनिश्चित करने में सहायता मिलती है। इसके अतिरिक्त प्लेटफॉर्म पर पुलिस वेरिफिकेशन रिकॉर्ड, आवश्यक फॉर्म, लीज एग्रीमेंट और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज डिजिटल रूप में संग्रहीत किए जा सकते हैं। इससे रिकॉर्ड कभी खोने या क्षतिग्रस्त होने की समस्या काफी हद तक समाप्त हो जाती है।
इसी तरह के ऐप को विकसित करने वालों में से एक दुष्यंत यादव का मानना है कि इनसे कई शहरों में बड़ी संख्या में छात्र और नौकरीपेशा युवा किराये पर रहते हैं, लेकिन उनका रिकॉर्ड स्थानीय स्तर पर व्यवस्थित रूप से उपलब्ध नहीं होता। डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होने से पुलिस और प्रशासन को सत्यापन प्रक्रिया में सुविधा मिल सकती है। किसी भी संदिग्ध गतिविधि या जांच के दौरान जानकारी तेजी से उपलब्ध कराई जा सकती है। AI आधारित रिपोर्टिंग सिस्टम का भी उपयोग किया है। PG संचालकों को occupancy, भुगतान स्थिति, लंबित रिकॉर्ड और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी व्यवस्थित तरीके से उपलब्ध हो सकती है। कंपनी के अनुसार वर्तमान में देशभर में लगभग 11,378 PG और हॉस्टल इस प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहे हैं।
देश में इस तरह के जो ऐप काम कर रहे हैं उनमें डिजिलॉकर के जरिए ई वेरीफिकेशन किया जाता है। एक्सपर्ट अभिषेक शर्मा व पदम यादव कहते हैं कि इन ऐप को काम में लेने वाले हॉस्टल्स व पीजी को एक यूनिक आईडी नम्बर प्रदान किया जाता है। इस आईडी में हॉस्टल, उसके ओनर व उनसे संबंधित सारी जानकारी निहित रहती है। इस यूनिक आईडी के आधार पर ही उन्हें एक बार कोड बनाकर दे दिया जाता है। इस बार कोड को ये हॉस्टल में लगाया जाता है।
जब भी कोई हॉस्टल या पीजी में रहने आता है तो उसे अपने मोबाइल से यह बार कोड स्केन करना होता है। इसके बाद आधार नम्बर से जुड़े मोबाइल नम्बर पर एक ओटीपी आता है, जिसके बाद उसकी सारी जानकारी ऐप में निहित हो जाती है। डिजिलॉकर में निहित सारे डॉक्यूमेंट के जरिए उसकी ओर से प्रदान किए गए डॉक्यूमेंट की केवाईसी करने के बाद ही रूम अलॉट किया जाता है।
Published on:
14 Jun 2026 06:28 pm
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