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जयपुर में फुटपाथ पर पढ़ा रहे डॉक्टर, इंजीनियर और रिटायर्ड अफसर, पढ़ रहे कचरा बीनने वाले और भीख मांगने वाले बच्चे

जो बच्चे कल तक हाथ में कटोरा और बोरी लेकर सड़कों पर घूमते थे, अभद्र भाषा में बात करते थे, आज उनके हाथों में पेंसिल-कॉपी है और जुबान पर तहजीब। जगतपुरा में महल रोड पर राधा रानी सर्किल के पास हर शाम को लगने वाली एक अनोखी क्लास ने इन बच्चों की जिंदगी बदल दी है।
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मनीष चतुर्वेदी

जयपुर। जो बच्चे कल तक हाथ में कटोरा और बोरी लेकर सड़कों पर घूमते थे, अभद्र भाषा में बात करते थे, आज उनके हाथों में पेंसिल-कॉपी है और जुबान पर तहजीब। जगतपुरा में महल रोड पर राधा रानी सर्किल के पास हर शाम को लगने वाली एक अनोखी क्लास ने इन बच्चों की जिंदगी बदल दी है। एक बच्चे से शुरू हुई यह मुहिम आज 60 से ज्यादा बच्चों का भविष्य संवार रही है। यह कर दिखाया है एक युवा इंजीनियर सत्यवान निर्मल ने।

निर्मल ने बीआईटी, रांची से अपनी पढ़ाई पूरी की है। फिलहाल जयपुर में कोचिंग संस्थान में पढ़ाकर अपना घर चलाते हैं। सत्यवान ने बताया कि साल 2025 के अगस्त महीने में जब वे हर दिन की तरह शाम को कोचिंग से पढ़ाकर अपने घर लौट रहे थे तो जगतपुरा सर्किल के पास छोटे-छोटे बच्चों को हाथ में कटोरा लेकर भीख मांगते और कचरा बीनते देखते थे। मासूमों की यह दुर्दशा देखकर उन्हें शिक्षित करने का संकल्प लिया।

'ओए तू पैसे दे और जा यहां से'.. शुरुआत में बच्चों का रवैया..

शुरुआत में जब सत्यवान ने इन बच्चों के पास जाकर उनसे बात करने का प्रयास किया तो कोई बच्चा कहता—"ओए तू पैसे दे और जा यहां से…" तो कोई कहता— "पढ़ना-लिखना अपने बस का नहीं है रे, अपने को तो इधर ही रोज कुआं खोदना है और रोज पानी पीना है। बच्चे पढ़ाई का नाम सुनते ही वहां से भाग जाते थे।

सरकारी स्कूल के छात्र को अक्षर ज्ञान भी नहीं

सत्यवान निर्मल ने जब इन बच्चों के बारे में मालूम किया तो चौंकाने वाली हकीकत सामने आई। कई बच्चे पास के सरकारी स्कूल में पढ़ाई कर रहे थे। लेकिन जमीनी हकीकत यह थी कि पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले छात्र को भी क, ख, ग जैसे अक्षर लिखना-पढ़ना या पहचानना तक नहीं आता था।

बस्तियों में परिजनों को जैसे-तैसे समझाकर लाए बच्चों को

बच्चों को सड़क से उठाकर सीधे क्लास में लाना आसान नहीं था। सत्यवान कच्ची बस्तियों में गए। वहां परिजनों से मुलाकात की। परिजनों ने विरोध किया क्योंकि बच्चा कमाने का जरिया था। लेकिन सत्यवान ने जैसे-तैसे उन्हें बच्चों को पढ़ाने के लिए राजी किया।

एक छात्र से हुई थी शुरुआत, आज 60 से ज्यादा

अगस्त 2025 में जब इस पाठशाला की शुरुआत हुई तो पहले दिन महज एक-दो बच्चे ही पढ़ने आए। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गई और आज 60 से ज्यादा बच्चे नियमित रूप से आ रहे हैं। हर दिन शाम को 5:30 बजे से 7:30 बजे तक महल रोड के फुटपाथ पर यह क्लास चलती है। शाम होते ही सड़क किनारे व्हाइट बोर्ड लग जाते हैं। आने-जाने वाले वाहन चालक और राहगीर इस नजारे को देखकर चकित रह जाते हैं।

चार अलग-अलग बैचों में बांटा गया है फुटपाथ पाठशाला को :

पहली क्लास: इसमें वे बच्चे हैं जिन्हें पेंसिल पकड़ना तक नहीं आता और जो देखकर भी नहीं लिख सकते। उन्हें बुनियादी अक्षर ज्ञान कराया जाता है।

दूसरी क्लास: इसमें वे बच्चे शामिल हैं जो बोर्ड पर देखकर अक्षर (क, ख, ग, घ) लिखना सीख चुके हैं।

तीसरी क्लास: इस बैच के बच्चे थोड़े एडवांस हो चुके हैं, जो अब काउंटिंग और जोड़-बाकी सीख रहे हैं।

चौथी क्लास: इसमें वे बच्चे बैठते हैं जिन्हें पूरी तरह से किताब पढ़ना और लिखना आता है और ये बच्चे अब नियमित स्कूल भी जाते हैं।

पेन-पेंसिल और किताबें सब कुछ 'फ्री'

बच्चों की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि इनके माता-पिता कॉपी-किताब का खर्च उठाने में पूरी तरह असमर्थ हैं। सभी बच्चों को पेन, पेंसिल, कॉपियां, ड्राइंग बुक्स और अन्य पाठ्य सामग्रियां पूरी तरह से निशुल्क उपलब्ध कराती जाती है।
डॉक्टर और रिटायर्ड अधिकारी, 12 अध्यापकों की बनी टीम आज इस फुटपाथ पाठशाला के पास करीब 12 अध्यापकों की एक मजबूत टीम है। इस टीम में डॉक्टर, इंजीनियर और कुछ रिटायर्ड उच्च अधिकारी भी शामिल हैं, जो हर दिन बारी-बारी से (4 से 5 अध्यापक रोज) इन बच्चों को पढ़ाने आते है।

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