
जयपुर में झाग ही झाग, देखें क्या है माजरा
जयपुर. कारखानों से कैमिकल वाला पानी नदी-नालों में नहीं छोड़ा जाए, इसके लिए नियम-कायदे तो हैं ही, हाईकोर्ट के आदेश भी हैं। इनकी पालना कराने के लिए अफसर-कार्मिकों की फौज भी कम नहीं है। इसके बावजूद कारखानों से 'जहरीला' पानी बेधड़क छोड़ा जा रहा है। ऐसे में शहर के ज्यादातर इलाकों में नदी-नालों का हाल खराब है। घूमना तो दूर, इनके आसपास से लोगों का गुजरना ही मुश्किल हो रहा है।
राजस्थान पत्रिका ने पड़ताल की तो सामने आया कि कुलिश स्मृति वन, द्रव्यवती नदी प्रोजेक्ट, मानसरोवर, सांगानेर, प्रतापनगर, जगतपुरा विधाणी, वीकेआइ क्षेत्र में कारखानों का कैमिकल युक्त पानी सीधे नदी-नालों में छोड़ा जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण मंडल के निर्देश के बावजूद कारखानों की मनमानी थम नहीं रही है। खुद मंडल ने भी इन इलाकों में कॉमन एफ्ल्यूएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) अब तक नहीं लगाया है। ऐसे में कैमिकल युक्त पानी का परिशोधन नहीं हो पा रहा है। कैमिकल युक्त पानी के कारण संबंधित क्षेत्रों में सफेद झाग की परत बिछती जा रही है। हवा के साथ सूखकर और उड़कर यह 'जहर' रास्तों व आसपास के घरों तक पहुंच रहा है। कुलिश स्मृति वन से गुजर रहे नाले का भी यही हाल है। जबकि पिछले दिनों जेडीए ने प्रदूषण नियंत्रण मण्डल को इसकी जानकारी देते हुए द्रव्यवती नदी प्रोजेक्ट का कार्य प्रभावित होने की स्थिति बताई थी। इसके बावजूद हालात नहीं सुधरे हैं।
सांगानेर में यह हाल
- 1000 छोटी-बड़ी औद्योगिक इकाइयां हैं सांगानेर क्षेत्र में रंगाई-छपाई सहित अन्य
- 750 कारखाने ऐसे हैं, जिनसे निकल रहे कैमिकल युक्त पानी को परिशोधित करने की व्यवस्था ही नहीं है
- 01 नहीं बल्कि कई कारखाने ऐसे भी हैं जहां परिशोधन की व्यवस्था तो है लेकिन उसका पूरी तरह उपयोग नहीं हो रहा
पानी और परिशोधन
- 19.3 मिलियन लीटर प्रदूषित जल
- 120 करोड़ रुपए से बनना है सीईटीपी
- 80 करोड़ रुपए केन्द्र से मिलेंगे
- 40 करोड़ रुपए राज्य सरकार देगी
जनता के लिए यह मुसीबत
- कैमिकल युक्त पानी वायु के साथ भूजल को भी प्रदूषित कर रहा है।
- प्रदूषित पानी के लगातार बहाव वाले क्षेत्र में करीब आधा किलोमीटर का दायरा प्रभावित होता है। इसमें पानी का दोहन और उपयोग घातक हो सकता है।
- पानी के पुनर्चक्रण में 4-5 माह लगते हैं लेकिन दोहन ज्यादा हो तो यह प्रकिया पूरी नहीं होती और प्रदूषित पानी निकलने लगता है।
- तत्काल फसल के लिए लाभदायक नजर आता है लेकिन भविष्य में जमीन के लिए खतरनाक साबित होता है।
- नदी-नालों की ऐसी स्थिति को लेकर एनजीटी एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सख्ती दिखाता रहा है।
अदालत के ये आदेश, मगर पालना नहीं
- हाईकोर्ट ने पिछले वर्ष अगस्त में प्रदूषण नियंत्रण मंडल को निर्देश दिए थे कि एनओसी व निर्धारित प्रबंधन के बिना संचालित फैक्ट्रियों को तत्काल बंद कराएं। इसके बाद कार्रवाई हुई, बिजली कनेक्शन काटे गए लेकिन स्थिति नहीं सुधरी।
- विजय सिंह पूनिया की जनहित याचिका पर हाईकोर्ट ने 7 मार्च 2003 को सरकार और रीको को कारखानों का दूषित जल बाहर आने से रोकने के लिए परिशोधन प्लांट लगाने के निर्देश दिए।
- कैग की रिपोर्ट में द्रव्यवती नदी प्रदूषित होने के लिए सांगानेर के कपड़ा रंगाई-छपाई कारखानों को जिम्मेदार माना गया था। रिपोर्ट में बताया था कि इन औद्योगिक इकाइयों से प्रदूषित पानी खुली भूमि और द्रव्यवती नदी में जाता है। ऐसी इकाइयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण लगभग अंतिम स्तर पर है और संभव है इस माह के अंत तक शुरू हो जाए। इसकी लगातार मॉनिटरिंग की जा रही है। यहां औद्योगिक इकाई का कैमिकल युक्त पानी नदी-नालों में नहीं डालने दिया जाएगा।
अरुण प्रसाद, सचिव, राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल
कैमिकल युक्त पानी नदी-नाले में छोड़ नहीं सकते हैं, इसीलिए जगह—जगह ट्रीटमेंट प्लांट बनाए जा रहे हैं। कुछ दिन पहले मुख्य सचिव स्तर पर हुई बैठक में भी इस पर मंथन हुआ है। प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने सितम्बर तक प्लांट शुरू करने के लिए कहा है। स्मृति वन में सीआइआइ के जरिए प्लानिंग की जा रही है।
वैभव गालरिया, जेडीसी
Published on:
09 Aug 2018 09:50 pm
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