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राजस्थान का ऐसा अनोखा गधाें का मेला, जहां तलाशने से भी नहीं मिलेंगे गधे, वजह जानकर चौंक जाएंगे आप…

Donkey Fair: राजधानी जयपुर के निकट भावगढ़ बंध्या में लगने वाले देश के प्राचीन मेलों में से एक श्री खलकाणी माता के गर्दभ मेले की रौनक़ अब फीकी पडऩे लगी है। मेले में घोड़ों की आवक ने अपने इन मेहनतकस चचेरे भाइयों से मैदान छीन लिया है। अब पूरे मैदान में घोड़े ही घोड़े नजर आ रहे है।

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देवेंद्र सिंह / जयपुर. राजधानी जयपुर के निकट भावगढ़ बंध्या में लगने वाले देश के प्राचीन मेलों में से एक श्री खलकाणी माता के गर्दभ मेले की रौनक़ अब फीकी पडऩे लगी है। मेले में घोड़ों की आवक ने अपने इन मेहनतकस चचेरे भाइयों से मैदान छीन लिया है। अब पूरे मैदान में घोड़े ही घोड़े नजर आ रहे है। गधों की उपेक्षा का हाल यह है कि कोई भी मंत्री संतरी या नेता इस मेले का उद्घाटन करने के लिए तैयार नहीं होता। सैकड़ों साल पुराने इस मेले में गधों की ढेंचू-ढेंचू घोड़ों की हिनहिनाहट के नीचे दब गई है। अब गधों के मैदान पर जिधर देखो उधर घोड़े ही नजर आते हैं। मेले का औपचारिक उद्घाटन इस बार संस्थान के संरक्षक ठा. उम्मेद सिंह राजावत की संरक्षता में वार्ड पार्षद सुभाष शर्मा ने किया। खलखाणी माता मानव सेवा संस्थान के अध्यक्ष भगवत सिंह राजावत ने बताया कि मेले का आयोजन व व्यवस्थाएं जयपुर नगर निगम करवाता है। सरकार यदि ध्यान तो यह मेला भी पुष्कर मेले की तरह बन सकता है।

मेले में पहले दूर-दूर से गधे आया करते थे
संस्थान के संरक्षक ठा. उम्मेद सिंह राजावत बताते है कि पहले लद्दाख और काबूल तक के गधे यहां बिकने के लिए आते थे। मेले में करीब एक सप्ताह तक रौनक रहती थी। लेकिन ये सब बीते समय की बाते रह गई। सरकार की अनदेखी और मशीनीकरण वजह से गधों की पूछ कम हो गई है। यही हाल रहा तो मेला इतिहास के पन्नों दर्ज होकर रह जाएगा।


***** पालक भी दुखी

***** पालक भी गधों की बेक़द्री से दुखी हैं। जयपुर के शास्त्री नगर से आए नवीन व वीरु का कहना है कि राजनीति में तो गधे और घोड़े सब बराबर हैं लेकिन अपने मैदान में घोड़े भारी पड़ रहे हैं। सरकार को मेले की सुध लेनी चाहिए ताकि फिर से इसकी प्रतिष्ठा कायम हो सके। पशुपालन विभाग भी मेले की सुध नहीं लेता।


मेले में जोरावर का जोर
मेले में कई नस्लों के घोड़ा-घोड़ी बिक्री के लिए आए हैं। लेकिन जयपुर से आए मारवाड़ी नस्ल का ब्लैक भंवर कलर का जोरावर सबकी आंखों का तारा बना हुआ है। 64 इंच ऊंची कदकाठी को गठिले बदन के घोड़े को देखकर हर किसी के पांव ठिठक जाते है। जयपुर से आए घोड़े के मालिक राजेंद्र सिंह का कहना घोड़े के खरीदार बहुत आए और मनमाफिक कीमत देने को भी तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने जोरावर की कीमत नहीं बताई। उनका कहना है कि वे उसकों किसी भी कीमत पर नहीं बेचेंगे।

मेले में हो रही खरीद-फरोख्त
मेले में राजस्थान के अलावा उत्तरप्रदेश के खरीदार आए है। बांदीकुुई के बिहालपुरा से आए पप्पू खान का कहना है कि वे पांच घोड़े-घोड़ी लेकर आए थे, जिनमें से तीन एक लाख दस हजार में बिक गए है। एक घोड़ा और एक घोड़ी बची है जिसके भी ग्राहक लगे हुए है। अच्छी कद-काठी की घोड़ी अस्मिना की कीमत 1.15 लाख रुपए लग चुकी है जबकि वे डेढ़ लाख रुपए मांग रहे हैं। बस्सी के लसाडि़या से 16 घोड़े-घोड़ी लेकर आए राजू लाल मीणा ने बताया कि मेले में पांच घोड़े-घोड़ी साढ़े पांच लाख में बेचे है। हिना के डेढ़ लाख लग गए, लेकिन वे दो लाख मांग रहे हैं। उनका कहना है मेला इस बार ना महंगा है और ना सस्ता है।