
जयपुर। जयपुर के दर्जियों का सवाई प्रतापसिंह और माधोसिंह द्वितीय के शासन में खासा रुतबा रहा। सवाई प्रतापसिंह ने रोड़ाराम दर्जी को राज्य का सेनापति बनाया। रोड़ाराम ने कई युद्धों में वीरता भी दिखाई। सन् 1784 में सिंधिया से हुए समझौते के तहत रोड़ाराम ने खजाना खाली होने के बाद भी महादजी सिंधिया को रकम देने में दौलतराम हल्दिया का सहयोग किया। रोड़ाराम को पीछे से लोग सूई शमशेर गज बहादुर भी कहते थे। बालाबक्स को माधोसिंह द्वितीय ने खवास की पदवी से नवाजा। बालाबक्स का शासन में खूब दबदबा रहा। उस समय में हुकम दरबार का और जबानी बालाबक्स खवास की कहावत मशहूर थी।
पुरोहित जी का कटला था दर्जियों की खास जगह
पुरोहित जी का कटला दर्जियों के सिलाई करने की खास जगह रही। इतिहासकार आनन्द शर्मा के मुताबिक रईसों व राजाओं की शेरवानी, अचकन, अंगरखी के अलावा बंद गले का कोट, सूई-धागे से कुर्ता पायजामा सिलने में दर्जियों का ऊंचा नाम रहा। सावों में बैल गाडिय़ों में लोग कटला में कपड़ा खरीद कर वहां बैठे दर्जियों को नाप दे जाते।
तालकटोरा निवासी सूआलाल गिनाणी के अनुसार रामगंज में दर्जियों का मोहल्ला और पुरानी बस्ती के गोविंद राजाजी का रास्ता में श्री नामदेव टांक क्षत्रिय दर्जी समाज का संत नामदेवजी मंदिर है। इसमें बि_ल स्वरुप भगवान कृष्ण सहित संत नामदेवजी विराजे हैं। कभी चुरुकों का रास्ता में जगदीश प्रसाद वर्मा सुई धागे से कुर्ता सिलने में प्रसिद्ध थे। बद्री नारायण, गट्टूलाल, श्रीकृष्ण अंगरखी सिलने में माहिर रहे।
सोने-चांदी के काम के माहिर दर्जी सिटी पैलेस में करते थे काम
गोविंदराम, महादेव, कपूरचन्द व आनन्दी लाल भी माने हुए सिलाई मास्टर रहे। वस्त्रों पर सोने चांदी के काम के माहिर दर्जी सिटी पैलेस के तोषाखाना और जरगरखाने में काम करते थे। खवास बालाबक्स के पोते सुदर्शन टांक ने बताया कि नाथूलाल दर्जी महान स्वतंत्रता सेनानी रहे। इसके अलावा डॉ.के.एल.कमल राजस्थान विश्व विद्यालय के कुलपति और डॉ.गोपीचन्द वर्मा प्रसिद्ध इतिहासकार रहे।
Published on:
03 May 2018 07:08 pm
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