
कारगिल विजय दिवस पर जयपुर के पूर्व सैनिकों ने सुनाई कहानियां (Photo-Patrika)
Kargil War Heroes: कारगिल युद्ध सिर्फ इतिहास के पन्नों में दर्ज एक जीत नहीं, बल्कि हजारों सैनिकों की जिंदगी का ऐसा अध्याय है, जिसे वे चाहकर भी कभी नहीं भूल सकते। 26 साल बीत जाने के बाद भी करगिल का नाम आते ही वीरों की आंखों के सामने बर्फ से ढकी चोटियां, गोलियों की गूंज, शहीद साथियों के चेहरे और बुलंदियों पर लहराता तिरंगा ताजा हो उठता है। यह कहना है जयपुर के उन जांबाज पूर्व सैनिकों का, जिन्होंने इस युद्ध में शामिल होकर न सिर्फ दुश्मन को खदेड़ दिया, बल्कि हर पल मौत से आंख मिलाते हुए इस जंग को जिया भी है। वीरों का कहना है कि आज भी उन पलों की यादें आंखें नम कर देती हैं, लेकिन इस बात पर गर्व है कि देश की इस ऐतिहासिक विजय में उनका भी खून-पसीना शामिल रहा। उन्होंने देश की युवा पीढ़ी से राष्ट्रसेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने का आह्वान किया है।
वर्ष-1997 में सेना में भर्ती हुआ था और दो साल बाद ही करगिल युद्ध में बतौर राइफलमैन 2 राजपूताना राइफल्स के साथ मोर्चे पर पहुंच गया। 12 जून 1999 को 22 दिन की भीषण लड़ाई के बाद हमने टोलोलिंग चोटी पर कब्जा कर लिया, लेकिन दुश्मन के काउंटर अटैक में माइन ब्लास्ट के कारण मेरा बायां पैर चला गया। उस ऑपरेशन में हमारे 9 साथी शहीद और 17 घायल हुए थे। हर सैनिक का सपना देश के लिए लड़ना होता है और मेरा यह सपना पूरा हुआ। करगिल विजय दिवस पर उन दिनों की यादें फिर ताजा होती हैं और यह देखकर गर्व महसूस होता है कि मैं देश के लिए कुछ कर सका। -रामसहाय बाजिया, रिटायर्ड राइफलमैन
पिता रामेश्वर सिंह द्वितीय विश्व युद्ध में सैनिक रहे थे, इसलिए वर्दी का जुनून मुझे बचपन से ही था। वर्ष 1989 में सेना में भर्ती हुआ। करगिल युद्ध के दौरान हमारी यूनिट फिरोजपुर से अमृतसर और व्यास पुल की सुरक्षा में तैनात रही। हर दिन चुनौतियों से भरा हुआ था। कई बार लगा कि बचना मुश्किल है, लेकिन मिशन पूरा करना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य था। जब जीत के बाद तिरंगा लहराता देखा तो लगा कि जीवन सफल हो गया। करगिल युद्ध ने हमें सिखाया कि वहां न कोई जाति थी, न भाषा… वहां सिर्फ भारत था। यही भावना हमें हर मुश्किल से लड़ाती रही। आज मेरा बेटा भी भारतीय सेना में अधिकारी बनने की ट्रेनिंग ले रहा है। -अमर सिंह शेखावत, रिटायर्ड ऑनरेरी कैप्टन
युद्ध शुरू होते ही मुझे हैदराबाद से जम्मू भेजा गया और सातवें दिन ही मोर्चे पर तैनात कर दिया गया। तीन जुलाई की रात दुश्मन से आमना-सामना हुआ। दुश्मन पहाड़ी पर मजबूत स्थिति में बैठा था और हम खड़ी चढ़ाई चढ़ रहे थे। हालात इतने विकट थे कि हमें एसओएस संदेश तक भेजना पड़ा, लेकिन हमारे जवानों का हौसला नहीं टूटा। हमने डटकर मुकाबला किया, दुश्मन को पीछे धकेला और पहाड़ी पर तिरंगा फहरा दिया। इस जंग में हमारे 16 साथी शहीद हो गए। युद्ध के दौरान पूरे देश ने हमारा हौसला बढ़ाया था, बहनों ने राखियां भेजीं, लोगों ने चिट्ठियां और खाने का सामान भेजा। चोटी पर जब तिरंगा लहराता देखा तो लगा कि हमारा हर संघर्ष सफल हो गया। -टीपू सुल्तान, रिटायर्ड ऑनरेरी कैप्टन
Updated on:
25 Jul 2026, 12:23 PM IST
Published on:
25 Jul 2026, 12:23 PM IST
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