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लघुकथा-न्याय के नाम पर!

समाज में दुष्कर्म की सजा शादी ही हो तो फिर इससे दुष्कर्म रुकेगा नहीं बल्कि बढ़ावा मिलेगा। चौपाल उठने को थी और सभी पंच-परमेश्वर की जय जयकार कर रहे थे।

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लघुकथा-न्याय के नाम पर!

लघुकथा-न्याय के नाम पर!

मोनिका राज

आज पूरे गांव में खुसफुसाहट तेज थी। कल्लू के बेटे ने मुनिया के साथ दुष्कर्म किया था। आज उसकी पंचायत लगनी थी। नियत समय पर पंचायत बैठी। दोनों पक्ष के साथ गांव के गणमान्य लोग भी मौजूद थे। मुनिया का रो-रो कर बुरा हाल था। दोनों पक्ष को सुनने के बाद सरपंच जी ने कहा, 'वैसे तो यह नही होना चाहिए था।

जो हो गया सो हो गया। अब बीच का रास्ता निकालने का सोचा जाए। मुनिया के बापू हम लोगों का निर्णय है कि मुनिया की शादी कल्लू के लड़के के साथ कर दी जाए। इससे तुम्हारी इज्जत को आंच भी नहीं आएगी। वरना इस घटना के बाद तुम्हारी बेटी से शादी कौन करेगा? वह तो कल्लू की भलमनसी है कि छोटी जात के होने के बावजूद भी वो मुनिया को अपनी बहू स्वीकार करने को तैयार है।' पंचायत में मौजूद लोगों की नजर कल्लू पर पड़ी।
सबकी नजर में प्रशंसा का भाव था। कल्लू की छाती चौड़ी हो रही थी। मुनिया के बापू ने भी लोक-लाज समझाकर हामी भर दी। किसी ने भी मुनिया की मर्जी जानना सही नहीं समझाा। मैं निर्णय सुनकर सन्न थी और मन ही मन सोचने लगी कि एक गंजेड़ी और दुष्कर्मी से मुनिया का विवाह कराना, कैसा न्याय है?
समाज में दुष्कर्म की सजा शादी ही हो तो फिर इससे दुष्कर्म रुकेगा नहीं बल्कि बढ़ावा मिलेगा। चौपाल उठने को थी और सभी पंच-परमेश्वर की जय जयकार कर रहे थे।

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पढ़ाकू महाशय

खेमू पाराशर

काफी समय बीत गया। वह शख्स अभी भी उस मोटी -सी किताब को पढ़ रहा था। किताब के पन्नों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था कि अभी और आधी किताब पढऩा बाकी है। एक मध्य के बस स्टैंड पर बस रुकी। कुछ सवारियां उतरीं और कुछ चढऩे लगीं। इनके साथ ही एक लगभग 10 साल की छोटी बच्ची जिसके हाथ में कुछ पर्चे थे अकेले ही बस में चढ़ी। वह सभी को एक-एक पर्चा देने लगी। पढ़ा तो मालूम चला कि बेचारी बोल नहीं सकती है और खाने के लिए कुछ मांग रही है। पढऩे के बाद नजर सीधी उस शख्स पर पड़ी जो मोटी-सी किताब को पढ़ रहा था, उसके हाथ में भी यह पर्चा था।

उसने उसको बिना पढ़े ही मरोड़ा और खिड़की से बाहर फेंक दिया। मैंने उस मुड़े हुए पर्चे को बाहर पड़ा देखा और वापस निगाहें उस शख्स पर दौड़ाईं। उसकी किताब के पीछे लिखा था- 'गंदगी हटाओ स्वच्छता फैलाओ' लेकिन जनाब ने पर्चे को कचरा समझाकर बस स्टैंड पर फेंक दिया। मैं समझा गया मोटी-मोटी किताबों को पढऩे वाले कई महाशय एक पन्ना पढऩा पसंद नहीं करते हैं।