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‘लैला मजनूं’ में दिखा कि औरतों को किसी भी युग में नहीं मिला इन्साफ

-वरिष्ठ रंगकर्मी रामगोपाल बजाज के निर्देशन में एनएसडी में तैयार किया गया नाटक

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जयपुर

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Mohmad Imran

Jul 08, 2023

'लैला मजनूं' में दिखा कि 'हासिल' करना ही सबकुछ नहीं है

'लैला मजनूं' में दिखा कि 'हासिल' करना ही सबकुछ नहीं है

जयपुर। इस्माइल चुनारा के लिखे नाटक 'लैला मजनूं' का निर्देशन वरिष्ठ रंगकर्मी रामगोपाल बजाज ने किया था। प्ले में अरब के उस दौर की कबीलाई संस्कृति, कायदे कानून के बीच औरतों की सामाजिक स्थितियों पर रोशनी डाली गई है। जवानी की दहलीज पर खड़ी लैला को कैस (मजनूं) से प्यार है, लेकिन इश्क में दीवाने कैस को दुनिया पागल समझती है। कैस के पिता लैला का रिश्ता लेकर जाता हैं, लेकिन लैला के पिता उसे ठुकरा देते हैं।

दो घंटे लंबे नाटक का मर्म उस दृश्य में दिखाई पड़ता है, जब अज्ञात कारण से लैला के पति की मौत हो जाती है । लैला को पता चलता है कि इस्लामी कानून के मुताबिक अब वह आजाद है और अपनी मर्जी से अपना पति चुन सकती है। तब वह पागलों की तरह मजनूं को खोजती है। इधर मजनूं लैला के इश्क में पागल होकर दीन-दुनिया से अनजान लैला की परछाईं को ही अपना मान चुका है। उसका प्रेम सांसारिक सीमाओं से परे आध्यात्मिकता में बदल चुका है। लैला भागती हुई उसके पास आती है और कहती है, 'कैस, मैं आ गई।' मजनूं, उसे देखता है और आगे बढ़ जाता है। हैरान सी लैला उसे आवजें देती रहती है आरैर वह अजनबी आवाज में कहता है, 'तुम कौन हो, क्या चाहती हो?' लैला रूआंसी होकर कहती है मैं तुम्हारी लैला हूं, तुम्हारे पास लौट आई हूं ।

वह कहता है, 'तुम मेरी लैला नहीं हो, मेरी लैला तो मेरी रूह में समाई है।' लैला जमीन पर बैठकर दोनों बाहें आसमान की ओर उठा खुदा से पूछती है, 'ऐ खुदा! मेरी किस्मत में ये जुदाई क्यों? नाटक में दिखाया गया कि धर्म और ईश्वर भी औरत के पक्ष में नहीं हैं। यह प्रेमकथा आधुनिक संदर्भ में प्रेम, सत्ता, राजनीति और महिलाओं की पितृसत्तात्मक दमन से मुक्ति के सवाल को नए सिरे से प्रस्तुत करती है।


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