
21 साल से बेबस सरकार, अब पार्षद पतियों की 'नेतागिरी' पर नकेल
भवनेश गुप्ता
जयपुर। शहरी सरकारों (नगरीय निकाय) में महिला पार्षदों (निर्वाचित) के पति, परिवारजन, रिश्तेदारों का दखल बढ़ता जा रहा है। इस दखल को रोकने के लिए सरकार 21 साल से जूझ रही है, लेकिन सफल नहीं हो पाई। नतीजा, पार्षद पति, परिवाजन निकायों की बैठकों में पहुंचकर मनमानी करते गए। कई जगह मामला झगड़े और निलंबन तक पहुंच गया।
सरकार अब फिर चेती और सख्ती बरतने के आदेश जारी किए हैं। इसके तहत इन्हें किसी भी सूरत में निकाय गतिविधि में दखल की अनुमति नहीं होगी। ऐसा हुआ तो संबंधित अधिकारी, कर्मचारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। स्वायत्त शासन विभाग ने इसके आदेश जारी किए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सरकार ने अफसरों की जवाबदेही तो तय कर दी, लेकिन जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों को सबक सिखाने का कोई मैकेनिज्म नहीं सुझाया।
इन्होंने भी किए प्रयास, लेकिन हालात वही
-जयपुर नगर निगम ग्रेटर के तत्कालीन आयुक्त यज्ञमित्र सिंह ने एक साल पहले आदेश जारी किए थे। इसमें पार्षद पति की 'नो-एंट्री' की गई। उन्हें निगम की बैठकों से दूर रखा गया।
-जयपुर नगर निगम ग्रेटर की पूर्व कार्यवाहक महापौर शील धाभाई ने भी पार्षद पति की एंट्री बंद कर दी थी। बाकायदा निगम दफ्तर में पार्षद पति की नो एंट्री के पर्चे लगाए गए थे।
ऐसा एक्शन हो तो बने बात : हां पति का भी दखल, सभापति निलंबित
स्वायत शासन विभाग ने दो दिन पहले मालपुरा नगर पालिका अध्यक्ष सोनिया सोनी को निलंबित किया। आदेश में बताया गया कि मामले की जांच की गई, जिसमें भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में दर्ज अपराधिक मामले में तथ्यों और अध्यक्ष के कार्य में पति द्वारा हस्तक्षेप करना साबित हुआ है।
महिला पार्षदों खुद एक्टिव हों
राजस्थान में नगर पालिका के चुनाव में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण है। स्वायत्त शासन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि आदेश के पीछे उनका मंतव्य यही है कि जनता ने उन्हें चुना है कि तो महिला पार्षद खुद सक्रिय हों। स्वयं समझे कि निगम की कार्यप्रणाली किस तरह चलती है।
Published on:
07 May 2022 07:44 pm
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