11 फ़रवरी 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

…लटका रहने दो अशोक गहलोत का मेडिकल कॉलेज

शहर में मेडिकल कॉलेज बनना मुश्किल है।

3 min read
Google source verification

image

raktim tiwari

Jul 14, 2015

शहर बरसों से मेडिकल कॉलेज खुलने का सपने पाले है और हालात यह हैं कि अमृतकौर अस्पताल में ही स्टाफ पूरा नहीं। आधे-अधूरे स्टाफ और संसाधन पूरे नहीं होने से जहां लोगों को समय पर उपचार नहीं मिल पा रहा, वहीं मरीज कतारों में अव्यवस्थाओं के बीच घंटों इंतजार को मजबूर हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कार्यकाल के आखिरी बजट में यहां मेडिकल कॉलेज (पीपी) पर स्वीकृति प्रदान की। इससे शहरवासियों में आशा का संचार हुआ, लेकिन यह घोषणा सपना बनकर रह गई। चिकित्सालय में समुचित उपचार नहीं मिल पाने पर कई संगठनों ने समय-समय पर विरोध दर्ज कराया, लेकिन अस्पताल में रिक्त पदों एवं विभाग के सर्वे में ब्यावर के प्रदेश में टॉप टेन में रहने के बावजूद मेडिकल कॉलेज की हसरत पूरी नहीं हो सकी।

हालत यह है कि चिकित्सकों के स्वीकृत 58 पदों में से हाल में 18 पद रिक्त हैं। अस्पताल में नर्सिंग स्टाफ के स्वीकृत 100 पद में से 47 पद रिक्त हैं। दूसरी ओर अस्पताल में प्रतिदिन का आउटडोर करीब एक हजार के पार रहता है। इन्डोर करीब 100 से अधिक रहता है। ब्यावर से तीन राष्ट्रीय राजमार्ग एवं दो राज्य राजमार्ग जुड़े हैं। ऐसे में आए दिन हादसे भी होते हैं। इन हालात में अभावों में चल रहे इस अस्पताल से इन्हें रेफर करने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। ऐसे में कई मरीज व गंभीर घायल तो समय पर इलाज नहीं मिल पाने की भारी कीमत चुकाते हैं।

प्रदेश का ट्रांजिट पॉइंट होने के अलावा पाली, राजसमंद, भीलवाड़ा व नागौर जिले की सीमाओं से घिरा होने के कारण ब्यावर में मरीजों व घायलों का दबाव बना रहता है। स्टाफ की कमी के चलते आइसोलेशन व ऑब्जर्वेशन वार्ड बंद पड़ा है, जबकि पुराने मेल मेडिकल वार्ड का उपयोग नहीं हो पा रहा है।

इसके अलावा नई बनी बर्न यूनिट व सर्जिकल वार्ड के लिए भवन का निर्माण हुए तीन साल गुजर जाने के बावजूद उपयोग नहीं हो पा रहा है। मरीजों के दबाव व भौगोलिक स्थिति के नजरिए से जहां अमृतकौर चिकित्सालय का अपना अलग महत्व है, वहीं हालात यह हैं कि आस-पास के कई जिला मुख्यालय के आउटडोर यहां से कम हैं।

इनके पद हैं खाली

वरिष्ठ विशेषज्ञ अस्थि, शल्य, नेत्र रोग, निश्चेतन, रेडियोलॉजी, शिशु, मेडिसन, कनिष्ठ विशेषज्ञ अस्थि, शल्य, मानसिक, वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी, चिकित्सा अधिकारी, डी.एन.एस, नर्सिंग अधीक्षक प्रथम, नर्सिंग अधीक्षक द्वितीय, नर्स ग्रेड प्रथम के 11 पद, नर्स ग्रेड द्वितीय के 36 पद, फार्मासिस्ट, फिजियोथैरेपिस्ट, लैब टेक्निशियन, रेडियोग्राफर, केयर टेकर, वरिष्ट डेन्टल टेक्निशियन, सहायक, वार्डबॉय सहित सफाई कर्मचारियों के पद रिक्त हैं।

शोपीस बन गए वार्ड

चिकित्सालय में मरीजों की सुविधा के लिए निजी सहयोग से ऊपरी तल पर वार्ड का निर्माण कराया गया, लेकिन चिकित्सकों की कमी के चलते इन वार्डों का उद्घाटन तक नहीं हो सका। लाखों की लागत से बने इन वार्डों पर ताले लटके हुए हैं। वार्ड में रखे पलंग तक जंग खा चुके हैं।

फैक्ट फाइल

अमृतकौर चिकित्सालय में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की ओर से 305 पलंग स्वीकृत हो रखे हैं। यहां पर 17 वार्ड बने हुए हैं। स्टाफ की कमी के चलते 12 वार्ड ही मरीजों को भर्ती किए जाने के काम आ रहे हैं। पंाच वार्ड पिछले दो साल से बंद पड़े हैं। इनमें से दो वार्ड का तो फीता कटने के बाद से ही वापस गेट नहीं खुल सका है। अस्पताल प्रशासन ने मेल व फिमेल वार्ड को प्रथम तल से बंद करके द्वितीय तल पर शिफ्ट कर दिया है।

इसी कारण प्रथम तल पर बने दोनों वार्ड बंद पड़े हैं। चिकित्सालय में ट्रोमा वार्ड, आइसोलोशन वार्ड, बर्न वार्ड, सर्जिकल वार्ड सहित ऑब्जर्वेशन वार्ड बंद पड़े हैं। इसमें से बर्न वार्ड व सर्जिकल वार्ड का तो फीता कटने के बाद से ही गेट खोलना किसी ने मुनासिब नहीं समझा।

बढ़ रहा गायनी का आंकड़ा

चार जिलों से घिरे अमृतकौर चिकित्सालय के गायनी वार्ड में प्रसूताओं का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। यहां प्रतिदिन 22 से 27 के करीब प्रसव होते हैं। इसमें से 10 सिजेरियन व 15 के करीब सामान्य प्रसव शामिल हैं। अस्पताल के आंकड़ों के अनुसार गत माह 31 मई तक 556 प्रसव हुए। इनमें से 270 के करीब सिजेरियन थे। यहां लगातार प्रसव के आंकड़ों में बढ़ोतरी होने से चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की ओर से अजमेर की तर्ज पर यहां पर भी जनाना अस्पताल (मदर चाइल्ड विंग) की अलग यूनिट बनाई जा रही है।

90 के दशक तक था दबदबा

नब्बे के दशक में जिले में ब्यावर का दबदबा था। जिले के अधिकांश स्टॉकिस्ट ब्यावर में थे। यहां से ही पूरे जिले में दवा सप्लाई होती थी। चिकित्सालय में वरिष्ठ विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद रिक्त होने व टूटने के साथ ही यह दबदबा कम होता चला गया। इसके बाद निजी चिकित्सालयों ने इस शहर की चिकित्सा आवश्यकता का ग्राफ बनाए रखा अन्यथा स्थिति विकट हो जाती। हाल में भी शहर में 17 निजी चिकित्सालय व नर्सिंग होम संचालित हैं। डेढ़ लाख आबादी पर 48 चिकित्सक, अब तीन लाख पर 40 हैं।

ये भी पढ़ें

image