literature in rajasthani language
जयपुर। जिस क्षेत्र में जन्म लिया, वहां की भाषा बोलने में शर्म कैसी। बात तो मायड़ भाषा में ही होना चाहिए। यह कहना है राजस्थानी भाषा की जानी—मानी साहित्यकार आनंद कौर व्यास का। उनका कहना है कि जब दूसरे प्रदेशों के लोग अपनी प्रादेशिक भाषा में ही बात करते हैं तो राजस्थान के लोगों को राजस्थानी बोलने में हिचक क्यों हो। इसमें बोलने वाले और लिखने वाले कम होते जा रहे हैं। भाषा के साथ किसी जगह की पूरी संस्कृति और सभ्यता जुड़ी होती है, भाष पिछड़ेगी तो स्थानीय संस्कृति का पतन भी होगा ही। इसीलिए सांस्कृतिक समृद्धता इसी में है कि हम अपनी मायड़ भाषा से प्रेम करना सीखें। बीकानेर में जन्मी आनंद कौर व्यास ने ये बातें साझा की शनिवार को आयोजित आखर कार्यक्रम में। प्रभा खेतान फाउंडेशन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में उनसे चर्चा की राजस्थान की चर्चित साहित्यकार मोनिका गौड़ ने।
अपने लिखने की यात्रा पर बात करते हुए आनंद कौर व्यास ने बताया कि उनकी शादी 13 साल की उम्र में हुई, तब तक वे आठवीं तक ही पढ़ पाई। बेटी पैदा होने के बाद उन्होंने दसवीं पास की और लिखने लगी। वे बताती हैं कि मीरां की धरती पर जन्म लिया तो कविताओं में रुचि थी, लेकिन लिखने बैठी तो उपन्यास लिख दिया। दो हिंदी उपन्यासों के बाद उन्होंने राजस्थानी में लिखना शुरू किया। बीकानेर में जन्मी आनंद कौर व्यास की राजस्थानी भाषा में कहानी संग्रह 'वै सुपना अै चितराम', 'मोल मिनखाचारै रा' प्रकाशित हो चुके हैं। राजस्थानी उपन्यास मून रा चितराम, राजस्थानी विविधा कूंकू पगलिया से उन्हें साहित्य जगत में सराहा गया। हिंदी उपन्यास कटते कगार और कल का कुहरा के साथ बाल साहित्य शैशव महान, बछेन्द्रीपाल, मदर टेरेसा प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की ओर से पुरस्कृत किया जा चुका है। गोदावरी देवी सरावगी पुरस्कार के साथ कई सारे पुरस्कार वे अपने नाम कर चुकी हैं। उन पर केंद्रित यह पूरी चर्चा राजस्थानी भाषा के नाम रही।
Published on:
12 Oct 2019, 7:02 PM IST
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