संकट के समय गांव सदा से याद आते रहे हैं, क्योंकि हम देश दुनिया के किसी हिस्से में जिंदगी को बसर करें, लेकिन गांव हमारी आत्मा का अभिन्न हिस्सा है। वो हमारी साहित्य-रचनाओं में रह रहकर लौटता है। कभी माटी की सौंधी गंध-सा तो कभी खुरदरे यथार्थ के संग पलकें नम किए हुए आता है। किताबें पढऩे का मन होता है, तो पढ़ लेता हूं। अभी वर्तमान को ठीक से पढ़ लेना मुश्लि है। कल्पना के कैनवास पर उकरती भविष्य की सारी रेखाएं धुंधली नजर आती हैं, फिर भी एक चटक रंग के आकस्मिक उभर आने की आखिरी उम्मीदें धुंधली नहीं पड़ती। मनुष्य की यही जिजीविषा उसे अन्य प्राणियों से भिन्न बनाती है। यह जिजीविषा मानव सभ्यता पर आए इस खतरे के दौर में भी बनी रहें। सब यही चाहते हैं। जहां चाह, वहां राह, तो इस भंवर से निकलने की भी कोई तो राह होगी। कयामत के दौर में कायनात के बचे रहने की उम्मीद तो बचाए रखें। और समय हमारे भीतर मनुष्यता का विस्तार करें।