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भगवान परशुराम ने ऐसा क्या किया कि शुरू हुई कावड़ यात्रा,जाने क्यो खुश होते है भगवान शिव कावड़ यात्रा के जल से स्नान कर

कावड़िए भोलेनाथ के जयकारे लगाते हुए चल रहे

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A group of crores of passengers on the streets in Jaipur

A group of crores of passengers on the streets in Jaipur

जयपुर

सड़कों पर कावड़ यात्रियों के जत्थे चल पड़े हैं। जयपुर शहर सहित देशभर में अलग-अलग स्थानों से कावड़ यात्रा शुरू हो गई हैं। कावड़िए भोलेनाथ के जयकारे लगाते हुए चल रहे हैं। मंदिरों में गलता से लाए हुए शिवालयों में ये कावड़िए शिवजी का जलाभिषेक कर रहे हैं। इसके चलते शिवालयों में भक्तों का तांता लगा हुआ है। शिव भक्त हाथ में कावड़ लिए केसरिया रंग में रंगे नजर आ रहे हैं। इस कावड़ यात्रा का श्रावण मास में अलग महत्व है। यही कारण है कि हर साल श्रावण मास में लाखों की तादाद में कांवडिये सुदूर स्थानों से आकर गंगा सहित अन्य नदियों व धार्मिक स्थलों से जल भरी कांवड़ लेकर पदयात्रा करके अपने गांव वापस लौटते हैं इस यात्रा को ही कांवड़ यात्रा बोला जाता है। इस जल से अपने निवास के आसपास शिव मंदिरों में शिव का अभिषेक किया जाता है। कहने को तो ये धार्मिक आयोजन भर है, लेकिन इसके सामाजिक सरोकार भी हैं। कांवड के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रूपी शिव की आराधना के लिए हैं।
ऐसे शुरू हुई थी यात्रा
माना जाता है कि भगवान परशुराम ने अपने आराध्य देव शिव के नियमित पूजन के लिए पुरा महादेव में मंदिर की स्थापना कर कांवड़ में गंगाजल से पूजन कर कांवड़ परंपरा की शुरुआत की। जो आज भी देशभर में काफी प्रचलित है। कांवड़ की परंपरा चलाने वाले भगवान परशुराम की पूजा भी श्रावण मास में की जानी चाहिए। भगवान परशुराम श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को कांवड़ में जल ले जाकर शिव की पूजा-अर्चना करते थे। शिव को श्रावण का सोमवार विशेष रूप से प्रिय है। श्रावण में भगवान आशुतोष का गंगाजल व पंचामृत से अभिषेक करने से शीतलता मिलती है।पुराणों के अनुसार भगवान परशुराम शिव जी के उपासक बताए गए हैं। इसके अलावा एक और कहानी बताई जाती है। जब समुद्र मंथन हुआ तब उसमें से विष निकला था। इसे शिव ने पिया था। इस विष को कम करने के लिए गंगा जी को बुलाया गया। तभी से सावन के महीने में शिव जी को गंगा जल चढ़ाने की पंरपरा बनी।

शिव की पूजा से यह मिलता है लाभ

भगवान शिव की हरियाली से पूजा करने से विशेष पुण्य मिलता है। खासतौर से श्रावण मास के सोमवार को शिव का पूजन बेलपत्र, भांग, धतूरे, दूर्वाकुर आक्खे के पुष्प और लाल कनेर के पुष्पों से पूजन करने का प्रावधान है। इसके अलावा पांच तरह के जो अमृत बताए गए हैं उनमें दूध, दही, शहद, घी, शर्करा को मिलाकर बनाए गए पंचामृत से भगवान आशुतोष की पूजा कल्याणकारी होती है।भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाने के लिए एक दिन पूर्व सायंकाल से पहले तोड़कर रखना चाहिए। सोमवार को बेलपत्र तोड़कर भगवान पर चढ़ाया जाना उचित नहीं है। शिव की पूजा से पहले नंदी व परशुराम की पूजा की जानी चाहिए। शिव का जलाभिषेक नियमित रूप से करने से वैभव और सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है।