21 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कहां गुम हो गया बंदर और भालू का खेल, क्यों दूर हो गया मदारी समाज अपने पुश्तैनी काम से

बीते जमाने में जब मोबाइल, टी. वी.और इंटरनेट जैसे मनोरंजन के साधन नही हुआ करते थे तब मदारी ही लोगों के मनोरंजन का काम गली-गली और मोहल्लों में जाकर किया करते थे ।

2 min read
Google source verification

जयपुर

image

Rajesh

Jun 14, 2018

juggler and monkey

mon

जयपुर

डमरू की आवाज सुनकर आज भी हम अपने बचपन की यादों में चले जाते हैं । जब ये आवाज सुनकर घरों से बाहर निकल जाया करते थे और हमारी आंखें जानवरों का तमाशा दिखाने वाले मदारी को ढूंढा करती थीं। लेकिन आज ये आवाज लगातार खामोश होती जा रही है। जानवरों का तमाशा अब खत्म हो गया है । बात इस तरह के खेल दिखाने वाले मदारी समाज की हो तो स्थिती आज भी खराब बनी हुई है ।


दिखाते थे बंदर,भालू और सांप जैसे जानवरों का खेल

बीते जमाने में जब मोबाइल, टी. वी.और इंटरनेट जैसे मनोरंजन के साधन नही हुआ करते थे तब मदारी ही लोगों के मनोरंजन का काम गली-गली और मोहल्लों में जाकर किया करते थे । इस समाज के लोग बंदर, भालू और सांप जैसे जानवरों का खेल दिखा कर लोगों का मनोरंजन करते थे साथ मे इनके बच्चे अलग-अलग तरह के करतब दिखा कर दर्शकों का दिल जीत लिया करते थे । लेकिन आज यह बाते समय के साथ गुम सी हो गई हैं।


कैसे समाप्त हुआ मदारी समाज का काम

समाज की अजीविका पूरी तरह खेल दिखाकर पैसे कमाने पर टिकी हुई थी । पहले ये लोग वन्य जीवों का खेल दिखा कर दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते थे । लेकिन धीरे-धीरे जब वन्यजीवों से संबंधित कानून सख्त हुए तो इस तरह के खेल दिखाने पर भी पाबंदी लग गई। इसके बाद से समाज के आगे काम का संकट खड़ा हो गया। ज्यादातर लोग अन्य काम-धंधों की ओर आकर्षित हो गए ।

समय बदला स्थिति वही

ये समाज जानवरों को इस तरह ट्रेंड कर दिया करता था कि बन्दर और भालू इनके हर इशारे को बखूबी समझ लिया करते थे । अब ये लोग मोहल्लों और बाजारों में जाकर केवल हाथ की कला और जादू दिखाकर आजीविका चला रहे हैं । जानवरों के अभाव में अब लोग खेलों में कम रुचि लेते हैं। जिससे समाज की स्थिति अब भी खराब ही बनी हुई है । शिक्षा के मामले में समाज काफी पिछड़ा हुआ है । समाज के काफी बच्चों ने स्कूल का मुंह तक नहीं देखा है। परकोटे में ये लोग आज भी झुग्गी झोगड़ियों में रह रहे हैं ।