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फेफड़े में सूजन, विश्व का दूसरा बड़ा रोग

फेफड़ों की नली में स्थायी रूप से सूजन यानी सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) का पूर्ण उपचार तो संभव नहीं है, लेकिन दवाइयों के सहारे इस पर नियंत्रण जरूर लगाया जा सकता है। मरीजों में से इस बीमारी से लगभग 16 फीसदी लोग ग्रस्त हैं। वर्तमान में इस रोग से पीडि़तों की चौथी सबसे बड़ी संख्या है। अगले पांच वर्ष में यह सबसे बड़ा दूसरा रोग हो जाएगा। इस वर्ष सीओपीडी की थीम ‘जिंदगी के लिए आपके फेफड़े’ (यूअर लंग्स फॉर लाइफ) है।

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फेफड़ों की नली में स्थायी रूप से सूजन यानी सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) का पूर्ण उपचार तो संभव नहीं है, लेकिन दवाइयों के सहारे इस पर नियंत्रण जरूर लगाया जा सकता है। मरीजों में से इस बीमारी से लगभग 16 फीसदी लोग ग्रस्त हैं। वर्तमान में इस रोग से पीडि़तों की चौथी सबसे बड़ी संख्या है। अगले पांच वर्ष में यह सबसे बड़ा दूसरा रोग हो जाएगा। इस वर्ष सीओपीडी की थीम ‘जिंदगी के लिए आपके फेफड़े’ (यूअर लंग्स फॉर लाइफ) है।

विशेषज्ञों के अनुसार सीओपीडी रोग के दौरान कफ या खांसी की समस्या तीन माह तक रहने पर यह और गंभीर हो जाता है और इसे क्रोनिक ब्रोंकाइटिस कहते हैं। अस्थमा पीडि़त भी सीओपीडी की श्रेणी में आते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक धूम्रपान (तंबाकू) के धुएं से होने वाला रोग सीओपीडी होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी, गोबर के कंडे, केरोसिन, कोयले से चूल्हे पर भोजन पकाने, तलने-भुनने, पानी गर्म करते समय उठने वाले धुएं से भी सीओपीडी रोग हो सकता है। खेतों में उडऩे वाली धूल से भी सीओपीडी रोग से पीडि़त होने का खतरा हो सकता है। दो मौसम के बीच के समय में यानी संधि काल में भी सीओपीडी रोग होने का खतरा हो सकता है।
फेफड़े होते हैं कमजोर: डॉ. रावल
गुजरात के वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. नरेंद्र रावल के अनुसार सीओपीडी के मरीजों के फेफड़े कमजोर हो जाते हैं। गुजरात व भारत ऐसे मरीजों की संख्या (कुल मरीजो) 8 से 16 फीसदी है। इनमें से प्रति वर्ष 1 फीसदी की मौत हो जाती है। यह रोज जलवायू और प्रदूषण के आधार पर ज्यादा कम होता रहता है।
यह हैं लक्षण
इसके लक्षण में मरीज को सूखी खांसी आती है, दवाई से खांसी ठीक नहीं होने पर धीरे-धीरे सांस चढऩे लगती है, बलगम गिरना, लगातार बुखार बना रहना, कभी-कभी सांस लेते समय फेफड़ों से आवाज आना आदि। ऐसे मरीज का लंग फंक्शन टेस्ट, पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट और स्पायरोमेटरी टेस्ट करते हैं। इन टेस्ट की रिपोर्ट से सीओपीडी की गंभीरता का पता लगाया जाता है। हृदय की इसीजी, 2डी इको की रिपोर्ट से हृदय की स्थिति का पता चलता है, उसी प्रकार लंग फंक्शन टेस्ट से फेफड़ों की कार्यक्षमता का पता चलता है।
लंग फंक्शन टेस्ट से चार चरण का चलता है पता
लंग फंक्शन टेस्ट की रिपोर्ट में 100 से 80 फीसदी को माइल्ड, 80 से 50 तक मोडरेट, 50 से 30 तक सीवियर, 30 फीसदी से कम वाले मरीजों की अत्यधिक सीवियर स्थिति सहित 4 चरण का पता चलता है। सीओपीडी के मरीजों के फेफड़ों का एक्स-रे, सीटी स्कैन, रक्त की जांच, इसीजी सहित आवश्यक टेस्ट भी करते हैं। सभी रिपोर्ट के आधार पर फेफड़ों की सूजन कम करने के लिए इन्हेलर, नेबुलाइजर के जरिए अलग-अलग ब्रोंकोडायलेटर दवाई दी जाती है।
गोल्ड की गाइडलाइन के अनुरूप पूरे विश्व में समान इलाज
डॉ. रावल के अनुसार ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर क्रोनिक आब्सट्रेक्टिव लंग डिजीज (गोल्ड) की गाइडलाइन के अनुरूप ही पूरे विश्व में सीओपीडी के मरीजों को चिकित्सक समान दवाई देकर इलाज करते हैं।सीओपीडी के साथ अस्थमा रोग बढऩे पर मरीजों कोर्टिगो स्टीरॉयड दवाई भी देने की नौबत आती है। हृदयाघात की भांति लंग अटैक होने पर अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ सकती है।